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Sunday, August 26, 2018

August 26, 2018

अंग्रेज और बंगाल तथा मैसूर शासकों के साथ उनकी लड़ाईया।


 ➢  बंगाल
  • मुगल साम्राज्य के अंतर्गत आनेवाले प्रांतों में बंगाल सर्वाधिक सम्पन्न राज्य था।
  • औरंगजेब के म्रत्यु के कुछ वर्षों के बाद बंगाल के सूबेदार मुर्शिद कुली खाँ ने स्वयं को बंगाल का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।
  • प्लासी का युद्ध 23 जून, 1757 ई0 को अंग्रेजों के सेनापति राॅबर्ट क्लाइव और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच हुआ। जिसमें नवाब अपने सेनापति मीरजाफर की धोखाधड़ी करने के कारण पराजित हुआ। अंग्रेजों ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया ।

British flag
ब्रिटिश भारत 

➢   बंगाल के नवाब 

  1. मुर्शिद कुली खाँ    1713- 1727 ई0
  2.  शुजाउद्दीन          1727- 1739 ई0
  3. सरफराज खाँ       1739- 1740 ई0
  4. अलीवर्दी खाँ        1740- 1756 ई0
  5. सिराजुद्दौला         1756- 1757 ई0
  6. मीरजाफर           1757- 1760 ई0
  7. मीरकासिम         1760- 1763 ई0
  8. मीरजाफर          1763- 1765 ई0
  9. निजाम-उद्दौला    1765- 1766 ई0
  10. शैफ-उद्दौला        1766- 1770 ई0
  11. मुबारक-उद्दौला   1770- 1775 ई0
  • क्लाइव के हाथों की कठपुतली नवाब मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 ई0 में हटाकर उसके दामाद मीरकासिम को बंगाल का नवाब बनाया।
  • मीरकासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंधेर  (मुगदलपुर) स्थानान्तरित किया।
  • बक्सर का युद्ध 1764 ई0 में अंग्रेजों और मीरकासिम, अवध के नवाब शुजाद्दौला और मुगल सम्राट् शाहआलम-II के बीच हुआ। इस युद्ध में भी अंग्रेज विजयी हुए। इस युद्ध में अंग्रेज सेनापति हेक्टर मुनरो था।
  • बक्सर के युद्ध के बाद एक बार फिर मीरकासिम की जगह मीरजाफर को बंगाल का नवाब बना दिया।
  • 5 जनवरी, 1765 ई0 में मीरजाफर की म्रत्यु हो गयी।



 ➢  मैसूर
  • 1761 ई0 में हैदर अली मैसूर का शासक बना।
  • हैदर अली की म्रत्यु 1782 ई0 में द्वितीय आँग्ला-मैसूर युद्ध के दौरान हो गयी।

  मैसूर राज्य के अंग्रेजों के साथ प्रमुख युद्ध।

 ➢     प्रमुख युद्ध               वर्ष        अंग्रेजी गवर्नर                                                       जनरल 
  1. प्रथम आँग्ला-मैसूर युद्ध    1767-69 
  2. द्वितीय आँग्ला-मैसूर युद्ध  1781-84  वारेनहेस्टिंग्स 
  3. तृतीय आँग्ला-मैसूर युद्ध   1790-92   कार्नवालिस 
  4. चतुर्थ आँग्ला-मैसूर युद्ध    1799      लॉर्ड वेलेजली 

  • हैदर अली का उत्तराधिकारी उसका पुत्र टीपू सुल्तान हुआ।
  • 1787 ई0 में टीपू ने अपनी राजधानी श्रीरंगपत्तनम में 'पादशाह' की उपाधि धारण की।
  • टीपू सुल्तान ने अपनी राजधानी श्रीरंगपत्तनम में स्वतन्त्रता का वृक्ष लगवाया और साथ ही जैकोबिन क्लब का सदस्य बना।
  • टीपू की म्रत्यु चतुर्थ आँग्ला-मैसूर युद्ध के दौरान 1799 ई0 में हो गयी।

  मैसूर राज्य के अंग्रेजों के साथ प्रमुख संधियाँ

  ➢  महत्वपूर्ण संधियाँ 

  1. द्वितीय आँग्ला-मैसूर युद्ध         मद्रास की संधि       
  2. द्वितीय आँग्ला-मैसूर युद्ध         मंगलूर की संधि      
  3. द्वितीय आँग्ला-मैसूर युद्ध        श्रीरंगपत्तनम की                                                 संधि 

नोटः अंग्रेजों की भारत में प्रथम महत्वपूर्ण विजय बंगाल विजय को माना जाता है।



August 26, 2018

पुष्यभूति वंश।


                    पुष्यभूति वंश

 ➢ पुष्यभूति वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:


  • गुप्त वंश के पतन के बाद हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर नरवर्ध्दन के द्वारा पुष्यभूति वंश की स्थापना हुई।
  • पुष्यभूति वंश का सबसे प्रतापी शासक प्रभाकरवर्धन था।
  • प्रभाकरवर्धन ने अपने पुत्री राजश्री का विवाह मौखिरी वंश के शासक ग्रहवर्मन से किया।
  • मालवा नरेश देवगुप्त और गौड़ शासक मिलकर ग्रहवर्मन की हत्या कर दी।
  • प्रभाकरवर्धन के बाद राज्यवर्धन गद्दी पर बैठा, जिसकी हत्या शशांक (गौड़ शासक) नेे कर दी।
  • राज्यवर्धन के बाद 606 ई0 में 16 वर्ष की अवस्था में हर्षवर्धन राजगद्दी पर बैठा।
  • हर्षवर्धन की प्रथम राजधानी थानेश्वर (कुरुक्षेत्र के निकट) थी। बाद में इसने अपनी राजधानी कन्नौज स्थापित की।
  • हर्षवर्धन के दरबार के प्रसिद्ध कवि थे- बाणभट्ट।
  • हर्षवर्धन की रचना है- नागानंद, रत्नावली, और प्रियदर्शिका।
  • हर्षवर्धन शिव का उपासक था।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था।
  • ह्वेनसांग को यात्रियों में राजकुमार, नीति का पंडित और वर्तमान शाक्यमुनि कहा जाता है।
  • ह्वेनसांग भारत में नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने और बौद्ध ग्रंथ संग्रह करने के उद्देश्य से आया था।
  • हर्षवर्धन शिलादित्य के नाम से जाना है।
  • हर्ष ने परम् भट्टारक नरेश की उपाधि धारण की थी।
  • हर्षवर्धन प्रतिदिन 500 ब्राह्मणों और 1000 बौद्ध भिक्षुओं को भोजन कराता था।
  • हर्ष ने 643 ई0 में कन्नौज और प्रयाग में दों विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया। हर्षवर्धन के द्वारा प्रयाग में आयोजित सभा को मोक्ष-परिषद् कहा गया है।
  • बाणभट्ट के हर्षचरित के अनुसार हर्ष की मंत्रिपरिषद् इस प्रकार थी-
  1. अवन्ति-  युद्ध और शांति का मंत्रि।
  2. सिंहनाद- हर्ष की सेना का महासेनापति।
  3. कुन्तल- अश्व सेना का मुख्य अधिकारी।
  4. स्कन्दगुप्त- हस्ति सेना का प्रमुख।
  • साधारण सैनिकों को चाट और भाट, अश्व सेना के अधिकारियों को बृहदेश्वर, पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत और महाबलाधिकृत कहा जाता था।

 नोट:  हर्षचरित के लेखक है- बाणभट्ट।

Saturday, August 25, 2018

August 25, 2018

मगध राज्य।


                    मगध राज्य


 ➢ मगध राज्य के बारे में महत्वपूर्ण बिन्दु:


  • मगध के सबसे प्राचीन वंश के संस्थापक बृहद्रथ था।
  • जरासंध के पिता का नाम बृहद्रथ था।
  • मगध की राजधानी गिरिब्रज (राजग्रह) थी।
  • मगध की गद्दी पर बिम्बिसार 545 ई0 पू0 में बैठा।
  • बिम्बिसार हर्यक वंश का संस्थापक था।
  • बिम्बिसार ने ब्रह्मदत्त को हराकर अंग राज्य को मगध में मिला लिया।
  • बिम्बिसार ने राजग्रह का निर्माण कर उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • बिम्बिसार ने मगध पर करीब 52 वर्षों तक शासन किया।
  • महात्मा बौद्ध की सेवा में बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को भेजा था। अवंति के राजा प्रद्योत जब पाण्डु रोग से ग्रसित थे उस समय भी बिम्बिसार ने जीवक को उनकी सेवा के लिए भेजा था।
  • बिम्बिसार ने वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इसने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से, वैशाली के चेटक की पुत्री चेल्लना से तथा मद्र देश (आधुनिक पंजाब) की राजकुमारी झेमा से शादी की।
  • बिम्बिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी और वह 493 ई0 पू0 में मगध की गद्दी पर बैठा।

  • अजातशत्रु का उपनाम कुणिक था।
  • अजातशत्रु ने 32 वर्षों तक मगध पर शासन किया।
  • अजातशत्रु प्रारंभ में जैनधर्म का अनुयायी था।
  • अजातशत्रु के सुयोग्य मंत्री का नाम वर्षकार (वरस्कार) था। इसी की सहायता से अजातशत्रु ने वैशाली पर विजय प्राप्त की।
  • अजातशत्रु की हत्या उसके पुत्र उदायिन् ने 461 ई0 पू0 में कर दी और वह मगध की गद्दी पर बैठा।
  • उदायिन् ने पाटिलग्राम की स्थापना की।
  • उदायिन् भी जैनधर्म का अनुयायी था।
  • हर्यक वंश का अंतिम राजा उदायिन् का पुत्र नागदशक था।
  • नागदशक को उसके अमात्य शिशुनाग ने 412 ई0 पू0 में अपदस्थ करके मगध पर शिशुनाग वंश की स्थापना की।
  • शिशुनाग ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से हटाकर वैशाली में स्थापित की।
  • शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक पुनः राजधानी को पाटलिपुत्र ले गया।
  • शिशुनाग वंश का अंतिम राजा नंदिवर्धन था।
  • नंदवंश का संस्थापक महापद्म नंद था। 
  • नंदवंश का अंतिम शासक घनानंद था। यह सिकंदर महान का समकालीन था। इसे चंद्रगुप्त मौर्य ने युद्ध में पराजित किया और मगध पर एक नये वंश 'मौर्य वंश' की स्थापना की।

नोटः  बिम्बिसार बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
August 25, 2018

सिन्धु सभ्यता।

          

                      सिन्धु सभ्यता


 ➢ सिन्धु सभ्यता के बारे में महत्वपूर्ण बातें:



  • सिन्धु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की थी।
  • रेडियोकार्बन जैसी नवीन विश्लेषण पध्दति के द्वारा सिन्धु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई0 पू0 से 1750 ई0 पू0 मानी गयी है।
  • इस सभ्यता के निवासी द्रविड़ एंव भुमध्यसागरीय थे।
  • सिन्धु सभ्यता या सैंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। इस सभ्यता में 6 नगरों को बड़ी नगरों की संज्ञा दी गयी है, ये हैं- मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलावीरा राखीगढ़ी और कालीबंगन। 
  • स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए है।
  • जोते हुए खेत और नक्काशीदार ईटों का प्रयोग कालीबंगन नगर में हुआ।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार को सिन्धु सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत मानी जाती है।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त बृहत् स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जिसके मध्य स्थित स्नानकुंड 11.88 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता (पशुपति नाथ) की मुर्ति मिली है। उनके चारों ओर हाथी, गैंडा, चीता, और भैया विराजमान है।
  • मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है।
  • हड़प्पा की मोहरों पर सबसे अधिक एक श्रृंगी पशु का अंकन मिलता है।
  • सिन्धु सभ्यता का बन्दरगाह था- लोथल और सुतकोतदा।
  • सिन्धु सभ्यता की लिपी भावचित्रात्मक है। यह लिपी दाईं से बाईं की ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दाईं से बाईं और दूसरी बाईं से दाईं ओर लिखी जाती थी।
  • सिन्धु सभ्यता के लोगों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रीड पद्धति अपनाई।
  • घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे। केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
  • सिन्धु सभ्यता में मुख्य फसल थी- गेहूँ और जौ।
  • रंगपुर और लोथल से चावल के दाने मिले है, जिनसे धान की खेती होने का भी प्रमाण मिलता है।
  • सिन्धु सभ्यता के लोग मिठाई के लिए शहद का प्रयोग करते थे।


  • सिन्धु सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों और चार पहियों वाली बैलगाड़ी या भैसगाड़ी का उपयोग करते थे।
  • इस सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा किया करते थे।
  • वृक्ष-पूजा और शिव-पूजा के प्रचलन के सबूत भी सिन्धु सभ्यता से मिलते है।
  • सिन्धु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी।
  • स्वस्तिक चिन्ह संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है। इस चिन्ह से सूर्योपासना का अनुमान लगाया जाता है।
  • सिन्धु सभ्यता के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है।
  • पशुओं में कुबड़ वाला साँड़, इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पुज्यनीय था। 
  • सिन्धु सभ्यता के लोग सूती और ऊनी वस्त्रों का उपयोग करते थे।
  • मनोरंजक के लिए सिन्धुवासी मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा आपस में खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे।
  • सिन्धु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।
  • पर्दा-प्रथा और वेश्यावृत्ति सिन्धु सभ्यता में प्रचलित थी।
  • शवों को जलाने और गाड़ने यानी दोनों प्रथाएँ प्रचलित थी। हड़प्पा में शवों को गाड़ने और मोहनजोदड़ो में शवों को जलाने की प्रथा विद्यमान थी। 
  • सिन्धु सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।

नोट: मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा                शब्द का अभिप्राय सिन्धु सभ्यता से ही है।

Friday, August 24, 2018

August 24, 2018

वैदिक सभ्यता।


               वैदिक सभ्यता


  • वैदिककाल का विभाजन दों भागों में किया गया है- 
  1. ऋग्वैदिक काल- 1500-1000 ई0 पू0 
  2. उत्तर वैदिककाल - 1000- 500 ई0 पू0पू0
  • आर्यों द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक सभ्यता कहा जाता है।
  • आर्य सर्वप्रथम पंजाब और अफगानिस्तान में बसे। मैक्स मूलर ने आर्यों का मूल निवास- स्थान मध्य एशिया को माना है।
  • आर्यों द्वारा विकसित सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी।
  • आर्यों की प्रशासनिक ईकाई आरोहि क्रम से इन पाँच भागों में बंटा था- कुल, ग्राम, विश, जन और राष्ट्र ।
  • ग्राम के मुखिया को ग्रामिणी और विश का प्रधान विशपति कहलाते थे। जन के शासक को राजन कहा जाता है।
  • समाज की सबसे छोटी ईकाई कुल या परिवार थी, जिसका मुखिया पिता होता था, जिसे कुलप भी कहा जाता था।
  • आर्यों का समाज पितृप्रधान था।
  • ऋग्वैदिक समाज चार वर्णों में विभाजित था। वे वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र। यह विभाजन व्यवसाय पर आधारित था। ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुषसूक्त में चतुर्वर्णों का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मण परम पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जाँघों से और शुद्र उनके पैरों से उत्पन्न हुए हैं।
  • वैदिककाल में बाल विवाह और पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था।
  • लेन-देन में वस्तु विनियम की प्रणाली प्रचलित थी।
  • आर्यों का मुख्य पेय पदार्थ सोमरस था। वह वनस्पति से बनाया जाता था।
  • आर्यों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे- संगीत, रथदौड़, घुड़दौड़ और द्यतक्रिड़ा 
  • आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन और कृषि था।


  • आर्यों का प्रिय पशु घोड़ा और सर्वाधिक प्रिय देवता इन्द्र  थे। आर्यों द्वारा खोजी गयी धातु लोहा थी। जिसे श्याम अयस् कहा जाता था। ताँबे को लोहित अयस् कहा जाता था।
  • ऋग्वेद में उल्लिखित सभीं नदियों में सरस्वती सबसे महत्वपूर्ण तथा पवित्र मानी जाती थी।
  • उत्तर वैदिककाल में इन्द्र के स्थान पर प्रजापति सर्वाधिक प्रिय देवता हो गए थे।
  • उत्तर वैदिककाल में राजा के राज्याभिषेक के समय राजसूर्य यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था।
  • उत्तर वैदिककाल में वर्ण व्यवसाय की बजाय जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगे थे।
  • 'सत्यमेवजयते' मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।
  • गायत्री मंत्र सविता नामक देवता को संबोधित है, जिसका संबंध ऋग्वेद से है।
  • महाकाव्य दो है- महाभारत और रामायण 
  • महाभारत का पुराना नाम जयसंहिता है। यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है
  • उपनिषदों की कुल संख्या है- 108
  • महापुराणों की संख्या है-  18
  • वेदांत की संख्या है-  6

नोट:  आर्यों की भाषा संस्कृत थी।

 ➢ ऋग्वैदिककालीन नदियाँ

   प्राचीन नाम     आधुनिक नाम
  1. क्रुभ                 कुर्रम 
  2. कुभा                काबुल
  3. वितस्ता            झेलम
  4. आस्किनी          चुनाव
  5. परुषणी            रावी
  6. शतुद्रि              सतलज 
  7. विपाशा            व्यास
  8. सदानीरा           गंडक
  9. दृसध्दती           घग्घर 
  10. सुवस्तु              स्वात्
 ➢ ऋग्वैदिककालीन देवता

   देवता           संबंध 
  1. इन्द्र          युद्ध का नेता और वर्षा का देवता।
  2. अग्नि        देवता और मनुष्य के बीच मध्यस्थ।
  3. वरुण        पृथ्वी और सूर्य के निर्माता, समुद्र का देवता।
  4. सोम         वनस्पति का देवता।
  5. विष्णु        विश्व के संरक्षक और पालनकर्ता 


Thursday, August 23, 2018

August 23, 2018

मौर्य साम्राज्य।

 

                  मौर्य साम्राज्य


 राजधानी:   पाटलिपुत्र (पटना)
 भाषा:         संस्कृत, प्रकति
 धर्म:           बौद्ध, जैन एंव आजीवक
 शासन:       राजतंत्र 


 ➢ मौर्य वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:


  • मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था।
  • चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई0 पू0 में हुआ था।
  • घनानंद को हराने में चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चंद्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री बना।
  • चाणक्य (कौटिल्य/ विष्णुगुप्त) द्वारा लिखित पुस्तक है अर्थशास्त्र, जिसका संबंध राजनीती से है।
  • नंद वंश के विनाश करने में चंद्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा पर्वतक से सहायता प्राप्त की थी।
  • चंद्रगुप्त मगध की राजगद्दी पर 322 ई0 पू0 में बैठा।
  • चंद्रगुप्त ने 305 ई0 पू0 में सेल्यूकस निकेटर को हराया।
  • सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया की शादी चंद्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी और युद्ध की संधि-शर्तों के अनुसार चार प्रांत काबुल, कंधार, हेरात और मकरान चंद्रगुप्त को दिए।
  • चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन गुरु भद्रबाहु से जैनधर्म की दीक्षा ली थी।
  • मेगास्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चंद्रगुप्त के दरबार में रहता था।
  • मेगास्थनीज द्वारा लिखी गयी पुस्तक इंडिका है।
  • चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच हुए युद्ध का वर्णन एप्पियानस ने किया है।
  • प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिया था।


  • चंद्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के                श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया।

    • चंद्रगुप्त मौर्य की म्रत्यु 298 ई0 पू0 में श्रवणबेलगोला में उपवास के द्वारा हुई।



    • चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिंदुसार हुआ, जो 298 ई0 पू0 में मगध की राजगद्दी पर बैठा।
    • अमित्रघात के नाम से बिंदुसार जाना जाता है। अमित्रघात का अर्थ है- शत्रु विनाशक।
    • बिंदुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।
    • 'वायुपुराण' में बिंदुसार को भद्रसार (वारिसार) कहा गया है।
    • स्टैबो के अनुसार सीरीयन नरेश एण्टियोकस ने बिंदुसार के दरबार में डाइमेकस नामक राजदूत भेजा। इसे ही मेगास्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है।
    • जैन ग्रंथों में बिंदुसार को सिहंसेन कहा गया है।
    • बिंदुसार के शासनकाल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है। इस विद्रोहों को दबाने के लिए बिंदुसार ने पहले सुसीम को और बाद में अशोक को भेजा।
    • एथीनियस के अनुसार बिंदुसार ने सीरीयन नरेश एण्टियोकस से मदिरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी।
    • बौद्ध विद्वान तारानाथ ने बिंदुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया है।




    • बिंदुसार का उत्तराधिकारी अशोक महान हुुआ जो 269 ई0 पू0  में मगध की राजगद्दी पर बैठा।


  • अशोक की माता का नाम सुभद्रंगी था।

    • राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवंति का राज्यपाल था।
    • मास्की और गुर्जरा अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मिलता है।
    • पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है।
    • अशोक ने अपने अभिषेक के आठवें वर्ष लगभग 261 ई0 पू0 में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।
    • प्लिनी का कथन है कि म्रिस का राजा फिलाडेल्फस टाॅलमी- II ने पाटलिपुत्र में डियानीसियस नाम का एक राजदूत भेजा था।
    • उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।
    • अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।


    • मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था। इसकी हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई0 पू0 में कर दी और शुंग वंश की नींव डाली।
    • अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में प्रांतों की संख्या 5 थी। प्रांतों को चक्र कहा जाता था।
    • प्रांतों के प्रशासक कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे।
    • प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था, जिसका प्रशासक विषयपति होता था।
    • प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका मुखिया ग्रामीक कहलाता था।
    • भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने ही किया।
    • अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्टी, ग्रीक और अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है।
    • ग्रीक और अरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान से,खरोष्टी लिपि का अभिलेख उत्तर पश्चिम पाकिस्तान से और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि का अभिलेख मिले हैं।
    • अशोक के शिलालेख की खोज 1750 ई0 में पाद्रेटी फेन्थैलर ने की थी। इसकी संख्या- 14 है।
    • अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सबसे पहली सफलता 1837 ई0 में जेम्स प्रिसेप को हुई।

    नोट:  विश्वविजेता सिकंदर महान का सेल्यूकस निकेटर          सेनापति था।


    Wednesday, August 22, 2018

    August 22, 2018

    गुप्त साम्राज्य।

         

                       गुप्त साम्राज्य


       राजधानी:     पाटलिपुत्र 
       भाषा:           संस्कृत, प्रकृति 
       धर्म:             हिंदू, बौद्ध, जैन
       शासन:         राजतंत्र 

    ➢ गुप्त वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

    • गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अंत में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ।
    • गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (240-280 ई0) था
    • श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280- 320 ई0) हुआ।
    • गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम था। यह 320 ई0 में गद्दी पर बैठा। इसने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की।
    • गुप्त संवत्  (319-320 ई0) की शुरुआत चन्द्रगुप्त प्रथम ने की।
    • चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ, जो 335 ई0 में राजगद्दी पर बैठा। इसने आर्यावर्त्त के 9 शासकों और दक्षिणावर्त्त के 12 शासकों को पराजित किया। इन्हीं विजयों के कारण इसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।
    • समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था।
    • समुद्रगुप्त विष्णु उपासक था।
    • समुद्रगुप्त ने अश्वमेधकर्त्ता की उपाधि धारण की।
    • समुद्रगुप्त संगीत-प्रेमी था। ऐसा अनुमान उसके सिक्कों पर उसे वीणा-वादन करते हुए दिखाया जाने से लगाया गया है।
    • समुद्रगुप्त ने विक्रमंक की उपाधि धारण की थी। इसे कविराज भी कहा जाता है।
    • समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त-II हुआ, जो 380 ई0 में राजगद्दी पर बैठा।
    • चन्द्रगुप्त-II के शासनकाल में चीनी बौद्ध यात्री फाहियान भारत आया।
    • शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त-II ने चाँदी के सिक्के चलाए।
    • चन्द्रगुप्त-II का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त या गोविंदगुप्त  (415-454 ई0) हुआ।
    • नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी।
    • कुमारगुप्त का उत्तराधिकारी स्कंधगुप्त (455- 467 ई0) हुआ।
    • स्कंधगुप्त ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झिल का पुनरुत्थान किया।
    • स्कंधगुप्त ने पर्णदत्त को सौराष्ट्र का गवर्नर नियुक्त किया।
    • स्कंधगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण शुरू हो गया।
    • अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त था।


    • चन्द्रगुप्त-II के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास थे।
    • चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहनेवाला आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरि थे।
    • गुप्तकाल में विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र (संस्कृत) को संसार का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ माना जाता है। बाइबिल के बाद इसका स्थान दूसरा माना जाता है। 
    • चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहनेवाले कुछ प्रमुख विद्वान थे- आर्यभट्ट,वाराहमिहीर,ब्रह्मगुप्त आदि।
    • पुराणों की वर्तमान रूप में रचना गुप्तकाल में हुई। इसमें ऐतिहासिक परम्पराओं का उल्लेख है।
    • गुप्तकाल में चाँदी के सिक्कों को रूप्यका कहा जाता था।
    • मंदिर बनाने की कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ।
    • सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।

    • गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई 'देश' थी, जिसके शासक को गोप्ता कहा जाता था।
    • दूसरी प्रादेशिक इकाई 'भुुुक्ती थी, जिसके शासक उपरिक कहलाते थे।
    • भुुुक्ती के नीचे विषय नामक प्रशासनिक इकाई होती थी, जिसके प्रमुख विषयपति कहलाते थे।
    • ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।
    • पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी दण्डपाशिक कहलाता था।
    • ग्राम- सभा का मुखिया ग्रामीक कहलाता था।
    • गुप्तकाल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
    • अंजता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही शेष हैं, जिनमें गुफा संख्या 16 और 17 ही गुप्तकालीन हैं। इसमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है।
    • गुफा संख्या 17 के चित्र को चित्रशाला कहा जाता है। इस चित्रशाला में बुध्द के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण और महापरिनिवार्ण की घटनाओं से संबंधित चित्र उध्द्दत किए गए हैं।
    • अंजता की गुफाएँ बौध्द धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।

    नोट: गुप्त सम्राट वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।

    August 22, 2018

    राजपूत राजवंश चौहान वंश, परमार वंश, चंदेल वंश।

                         

                          चौहान वंश

      ➢  चौहान वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:


    • चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव था। इस वंश की प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्र थी बाद में अजयराज द्वितीय ने अजमेर नगर की स्थापना की और उसे अपनी राजधानी बनाया।
    • इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अर्णोराज के पुत्र विग्रहराज-IV वीसलदेव  (1153- 1163 ई0) हुआ।
    • हरिकेली नामक संस्कृत नाटक के रचयिता विग्रहराज-IV था।
    • सोमदेव विग्रहराज-IV के राजकवि थे। इन्होंने ललित विग्रहराज नामक नाटक लिखा।
    • अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद शुरु में विग्रहराज-IV द्वारा निर्मित एक विद्यालय था।
    • इस वंश का अंतिम शासक पृथ्वीराज-III था।
    • रणथम्भौर के जैन मंदिर का शिखर पृथ्वीराज-III ने बनवाया था।
    • तराईन का प्रथम युद्ध 1191 ई0 में हुआ, जिसमें पृथ्वीराज-III ने मुहम्मद गोरी को हरा दिया।
    • तराईन का द्वितीय युद्ध 1192 ई0 में हुआ, जिसमें मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया।


    नोट: चंदवरदाई पृथ्वीराज-III का राजकवि था,                    जिसकी रचना पृथ्वीराजरासो है।


                     

                        परमार वंश   
     ➢ परमार वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

    • परमार वंश का संस्थापक उपेंद्रराज था। इसकी राजधानी धारा नगरी थी। (प्राचीन राजधानी- उज्जैन) 
    • परमार वंश का सबसे शक्तिशाली शासक राजा भोज था।
    • राजा भोज ने भोपाल के दक्षिण में भोजपुर नामक झिल का निर्माण करवाया।
    • नैषधीयचरित के रचनाकार श्रीहर्ष थे।
    • राजा भोज ने चिकित्सा, गणित और व्याकरण पर अनेक ग्रंथ लिखे। 
    • नवसाहसाड्क चरित के रचयिता पद्मगुप्त, दशरुपक के रचयिता धनंजय, धनिक, हलायुध और अमितगति जैसे विद्वान वाक्यपति मुंज के दरबार में रहते थे।
    • कविराज की उपाधि से विभूषित शासक था- राजा भोज।
    • भोज ने अपनी राजधानी में सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया था।
    • इस मंदिर के परिसर में संस्कृत विद्यालय भी खोला गया था।
    • राजा भोज के शासनकाल में धारा नगरी विद्या और विद्वानों का प्रमुख केंद्र था।
    • भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया।
    • परमार वंश के बाद तोमर वंश का, उसके बाद चौहान वंश का और अंतत: 1297 ई0 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नसरत खाँ और उलुग खाँ ने मालवा पर अधिकार कर लिया।
    नोट: भोजपुर नगर की स्थापना राजा भोज ने की थी।




                          चंदेल वंश

     ➢ चंदेल वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

    • प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद बुंदेलखंड की भूमि पर चंदेल वंश का स्वतंत्र राजनितिक इतिहास प्रारंभ हुआ।
    • चंदेल वंश का संस्थापक है- नन्नुक (831 ई0)
    • इसकी राजधानी खजुराहो थी। प्रारंभ में इसकी राजधानी कालिंजर (महोबा) थी।
    • राजा धंग ने अपनी राजधानी कालिंजर से खजुराहो में स्थानांतरित की थी।
    • चंदेल वंश का प्रथम स्वतंत्र और सबसे प्रतापी राजा यशोवर्मन था।
    •  यशोवर्मन ने कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा देवपाल को हराया और उससे एक विष्णु की प्रतिमा प्राप्त की, जिसे उसने खजुराहो के विष्णु मंदिर में स्थापित की।
    • धंग ने ही  जिन्न नाथ, विश्वनाथ, वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
    • धंग ने गंगा-यमुना के पवित्र संगम में शिव की आराधना करते हुए अपने शरीर का त्याग किया।
    • चंदेल शासक विद्याधर ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी, क्योंकि उसने महमूद के आक्रमण का सामना किए बिना ही आत्मसमर्पण कर दिया था।
    • विद्याधर ही अकेला भारतीय नरेश था जिसने महमूद गजनी की महत्वाकांक्षाओं का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।
    • चंदेल शासक किर्तिवर्मन की राज्यसभा में रहनेवाले कृष्ण मिश्र ने प्रबोध चंद्रोदय की रचना की थी।
    • किर्तिवर्मन ने महोबा के समीप किर्तिसागर नामक जलाशय का निर्माण किया।
    • आल्हा-उदल नामक दों सेनानायक परमर्दिदेव के दरबार में रहते थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करते हुए अपनी जान गँवायी थी।
    • चंदेल वंश के अंतिम शासक परमर्दिदेव ने 1202 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक की अधिनता स्वीकार कर ली। इस पर उसके मंत्री अजयदेव ने उसकी हत्या कर दी।
    नोट: बुंदेलखंड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है।




                       सोलंकी वंश

    ➢ सोलंकी वंश के बारे महत्वपूर्ण बातें:

    • सोलंकी वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था।
    • इसकी राजधानी अन्हिलवाड़ थी।
    • मूलराज प्रथम शैवधर्म का अनुयायी था।
    • भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
    • भीम प्रथम के सामंत बिमल ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर बनवाया था।
    • सोलंकी वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक जयसिंह सिध्दराज था।
    • माऊण्ट आबु पर्वत (राजस्थान) पर एक मंडप बनाकर जयसिंह सिध्दराज ने अपने सात पूर्वजों की गजारोही मूर्त्तियों की स्थापना की।
    • मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण सोलंकी राजाओं के शासनकाल में हुआ था।
    • सिध्दपुर के रुद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण जयसिंह सिध्दराज ने ही किया था।  
    • सोलंकी शासक कुमारपाल जैन-मतानुयायी था। वह जैन धर्म के अंतिम राजकीय प्रवर्तक के रुप में प्रसिद्ध है।
    • सोलंकी वंश का अंतिम शासक भीम-II था।
    • भीम-II के एक सामंत लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की थी।
    • बघेल वंश का कर्ण-II गुजरात का अंतिम हिंदू शासक था, इसने अलाउद्दीन खिलजी की सेेनाओं का मुकााबला किया था।

    नोट: प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचंद्र जयसिंह सिध्दराज के          दरबार में रहता था।



    Tuesday, August 21, 2018

    August 21, 2018

    पाल वंश, सेनवंश और कश्मीर के राजवंश।

                         

                            पाल वंश

     ➢ पालवंश के बारें में महत्वपूर्ण बातें:


    • पाल वंश का संस्थापक गोपाल (750 ई0) था।
    • इस वंश की राजधानी मुंगेर थी।
    • गोपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसने ओदंतपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
    • पाल वंश के प्रमुख शासक थे- धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल, महिपाल, नयपाल, आदि।
    • कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष पालवंश, गुर्जर प्रतिहार वंश और राष्ट्रकूट वंश के बीच हुआ। इसमें पालवंश की ओर से सर्वप्रथम धर्मपाल शामिल हुआ था।
    • पालवंश का सबसे महान शासक धर्मपाल था इसी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
    • 11वीं सदी के गुजराती कवि सोडठल ने धर्मपाल को 'उत्तरापथ स्वामी' की उपाधि से संबोधित किया है।
    • ओदंतपुरी (बिहार) के प्रसिद्ध बौद्ध मठ का निर्माण देवपाल ने करवाया था।
    • जावा के शैलेन्द्रवंशी शासक बालपुत्र देव के अनुरोध पर देवपाल ने उसे नालंदा में एक बौद्धविहार बनवाने के लिए पाँच गाँव दान में दिए थे।
    • गौड़ीरीति नामक साहित्यिक विद्या का विकास पाल शासकों के समय में हुआ।

     नोट:  पाल शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।


                              सेन वंश

     ➢ सेनवंश के बारें में महत्वपूर्ण बातें:

    • सेन वंश की स्थापना सामंत सेन ने राढ़ में की थी।
    • इसकी राजधानी नदिया (लखनौती) थी।
    • सेन वंश के प्रमुख शासक विजयसेन, बल्लार सेन और लक्ष्मण सेन थे।
    • सेन वंश के प्रथम स्वतंत्र शासक विजयसेन था, जो शिवधर्म का अनुयायी था।
    • दानसागर और अद्भुत सागर की रचना सेन शासक बल्लालसेन ने की थी।अद्भुत सागर को लक्ष्मण सेन ने पूर्णरूप दिया था।
    • लक्ष्मण सेन की राज्यसभा में गीतगोविंद के लेखक जयदेव, पवनदूत के लेखक धोयी और ब्राह्मणसर्वस्व के लेखक हलायुद्ध रहते थे।
    • हलायुद्ध लक्ष्मण सेन का प्रधान न्यायाधीश और मुख्यमंत्री था।
    • विजयसेन ने देवपाड़ा में प्रद्युम्नेश्वर मंदिर (शिव की विशाल मंदिर) की स्थापना की।
    • सेन राजवंश प्रथम राजवंश था, जिसने अपना अभिलेख सर्वप्रथम हिंदी में उत्कीर्ण करवाया।

     नोट: लक्ष्मण सेन बंगाल का अंतिम हिन्दू राजा था।



                        कश्मीर के राजवंश  

     ➢ कश्मीर राजवंश के बारें में महत्वपूर्ण बातें:

    • कश्मीर पर शासन करने वाले शासक वंश कालक्रम से इस प्रकार थे- कार्कोट वंश, उत्पल वंश, लोहार वंश।
    • 7वीं शताब्दी में दुर्लभवर्ध्दन नामक व्यकि ने कश्मीर में कार्कोट वंश की स्थापना की।
    • प्रतापपुर नगर की स्थापना दुर्लभक ने की।
    • कार्कोट वंश का सबसे प्रतापी राजा ललितादित्य मुक्तापीड था।
    • कश्मीर का मर्त्तण्ड मंदिर का निर्माण ललितादित्य के द्वारा करवाया गया था।
    • कार्कोट वंश के बाद कश्मीर पर उत्पक वंश का शासन हुआ। इस वंश का संस्थापक अवंतिवर्मन था।
    • अवंतिवर्मन के अभियन्ता सूय्य ने सिचांई के लिए नहरों का निर्माण करवाया।
    • 980 ई0 में उत्पक वंश की रानी दिद्दा एक महत्वकांक्षिणी शासिका हुई।
    • उत्पक वंश के बाद कश्मीर पर लोहार वंश का शासन हुआ।
    • लोहार वंश का संस्थापक संग्रामराज था।
    • संग्रामराज के बाद अन्नत राजा हुआ। इसकी पत्नी सुर्यमती ने प्रशासन को सुधारने में उसकी सहायता की।
    • लोहार वंश का शासक हर्ष विद्वान, कवि और कई भाषाओं का ज्ञाता था।
    • कल्हण हर्ष का आश्रित कवि था।
    • जयसिंह लोहार वंश का अंतिम शासक था, जिसने 1128 ई0 से 1155 ई0 तक शासन किया। जयसिंह के शासन के साथ ही कल्हण की राजतरंगिणी का विवरण समाप्त हो जाता है

     नोट: अवंतिपुर नामक नगर की स्थापना अवंतिवर्मन           ने की थी।

    Monday, August 20, 2018

    August 20, 2018

    चालुक्य वंश

               

                   चालुक्य वंश (कल्याणी)

      राजधानी:     वतापी (बदामी), कल्याणी, वेंगी
      भाषा:           कन्नड, संस्कृत
      धर्म:             हिंदू, बौद्ध, जैन
      शासन:         राजतंत्र 


    ➢ चालुक्य वंश (कल्याणी) के बारे में महत्वपूर्ण           बातें:


    •  कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना तैलप- II ने की थी।
    • तैलप- II की राजधानी मान्यखेट थी।
    • चालुक्य वंश (कल्याणी) के प्रमुख शासक हुए- तैलप- I, तैलप- II, विक्रमादित्य, जयसिंह, सोमेश्वर, सोमेश्वर-II,  विक्रमादित्य-VI, सोमेश्वर-III, और तैलप- III।
    • सोमेश्वर-I ने मान्यखेट से राजधानी हटाकर कल्याणी (कर्नाटक) को बनाया।
    • इस वंश  का सबसे प्रतापी राजा विक्रमादित्य-VI था।
    • विल्हण और विज्ञानेश्वर विक्रमादित्य-VI के दरबार में ही रहते थे।
    • मिताक्षरा  (हिंदू विधि ग्रंथ, याज्ञवल्क्य स्मृति पर व्याख्या) नामक ग्रंथ की रचना महान विधिवेत्ता विज्ञानेश्वर ने की थी।
    • विक्रमांकचरित की रचना विल्हण ने की थी। इसमे विक्रमादित्य-VI के जीवन पर प्रकाश डाला गया है।

                        चालुक्य वंश (वतापी)

    ➢ चालुक्य वंश (कल्याणी) के बारे में महत्वपूर्ण           बातें:

    • वतापी के चालुक्य वंश की स्थापना जयसिंह ने की थी।
    • इसकी राजधानी वतापी (बीजापुर) थी।
    •  चालुक्य वंश  (वतापी) के प्रमुख शासक थे- पुुुुलकेशिन-I,किर्त्तिवर्मन, पुुुुलकेशिन-II, विक्रमादित्य, विनयादित्य, और विजयादित्य।
    • इस वंश का सबसे प्रतापी राजा पुुुुलकेशिन-II था।
    • महाकूट स्तम्भ लेख से प्रमाणित होता है कि  पुुुुलकेशिन बहुुुु सुवर्ण और अग्निष्टोम यज्ञ सम्पन्न करवाया था।
    •  पुुुुलकेशिन-II ने हर्षवर्ध्दन को हराकर परमेश्वर की उपाधि धारण की।
    •  पुुुुलकेशिन-II वातापी चालुक्य शासकों में सर्वाधिक पराक्रमी और महान था। इसने 'दक्षिणापथेश्वर' की उपाधि धारण की थी।
    • पल्लववंशी शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुुुुलकेशिन-II को परास्त किया और उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया। सम्भवतः इसी युद्ध में पुुुुलकेशिन-II मारा गया। इसी विजय के बाद नरसिंहवर्मन ने 'वातापिकोड' की उपाधि धारण की।
    • ऐलोह अभिलेख का संबंध पुुुुलकेशिन-II से है।
    • जिनेन्द्र का मेगुती मंदिर पुुुुलकेशिन-II ने बनवाया था।
    • अजन्ता के एक गुफा चित्र में फारसी दूत-मंडल का स्वागत करते हुए पुुुुलकेशिन-II को दिखाया गया है।
    • वातापी का निर्माणकर्त्ता किर्त्तिवर्मन को माना जाता है।
    • मालवा को जीतने के बाद विनयादित्य ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की।
    • विक्रमादित्य- II के शासनकाल में ही दक्कन में अरबों ने आक्रमण किया। इस आक्रमण का मुकाबला विक्रमादित्य के भतीजा पुलकेशी ने किया। इस अभियान की सफलता पर विक्रमादित्य- II नेे इसे अवनिजनाश्रय की उपाधि प्रदान की।
    • विक्रमादित्य- II की प्रथम पत्नी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में विरूपाक्षमहादेव मंदिर का निर्माण करवाया।
    • विक्रमादित्य- II की दूसरी पत्नी त्रैलोक्य दैवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
    • इस वंश का अंतिम राजा किर्त्तिवर्मन- II  था। इसे इसके सांमत दंतिदुर्ग ने परास्त कर एक नये वंश (राष्ट्रकूट वंश) की स्थापना की।


                        चालुक्य वंश (वेंगी)

    ➢ चालुक्य वंश (कल्याणी) के बारे में महत्वपूर्ण           बातें:

    • बेंगी के चालुक्य वंश की स्थापना विष्णुवर्धन था।
    • इसकी राजधानी बेंगी (आंध्र प्रदेश) में थी।
    • इस के प्रमुख शासक थे - जयसिंह-I, इंद्रवर्धन, विष्णुवर्धन-II, जयसिंह-II, और विष्णुवर्धन-III.
    • इस वंश के सबसे प्रतापी राजा विजयादित्य-III था। जिसका सेनापति पंडरंग था।




    Sunday, August 19, 2018

    August 19, 2018

    चोल वंश।

                       

                            चोल वंश


    ➢ चोल वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

    • चोल वंश के संस्थापक विजयालय (850- 87 ई0)
    • इसकी राजधानी तांजाय  (तंजौर या तंक्षुवर) था।
    • विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की  थी।
    • चोलों का स्वतंत्र राज्य आदित्य प्रथम ने किया था।
    • पल्लवों पर विजय पाने के बाद आदित्य प्रथम ने कोदण्डराम की उपाधि धारण की।
    • चोल वंश के प्रमुख राजा था- परांतक-I, राजराज-I, राजेंद्र-I, राजेंद्र-II, और कुलोत्तंग।
    • तक्कोलम के युद्ध में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण-III ने परांतक-I को पराजित किया। इस युद्ध में परांतक-I का बड़ा लड़का राजादित्य मारा गया।
    • राजराज-I ने श्रीलंका पर आक्रमण किया। वहाँ के राजा महिम-V को भागकर श्रीलंका के दक्षिण जिला रोहण में शरण लेनी पड़ी।
    • राजराज-I ने श्रीलंका के विजित प्रदेशों को चोल साम्राज्य का एक नया प्रांत मुम्ड़िचोलमंडलम बनाया और पोलन्नरुवा को इसकी राजधानी बनाया।
    • राजराज-I शैव धर्म का अनुयायी था।
    • राजराज-I ने तांजौर राजराजेश्वर का शिवमंदिर बनवाया।
    • चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेंद्र-I के शासनकाल में हुआ।
    • बंगाल के पाल शासक महिपाल को पराजित करने बाद राजेंद्र-I ने गंगैकोडचोल की उपाधि धारण की और अपनी नवीन राजधानी गंगैकोड चोलपुरम के निकट चोलगंगम नामक विशाल तालाब का निर्माण करवाया।
    • राजेंद्र-II ने प्रकेसरी की उपाधि धारण की।
    • वीर राजेंद्र ने राजकेसरी की उपाधि धारण की।
    • चोल वंश का अंतिम राजा राजेंद्र-III था।
    • चोलों और पश्चिमी चालुक्य के बीच शांति स्थापित करने में गोवा के कदम्ब शासक जयकेश-I ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
    • कुलोत्तंग-II ने चिदंबरम मंदिर में स्थित गोविंदराज  (विष्णु) की मूर्त्ति को समुद्र में फेकवा दिया, कालांतर में वैष्णव आचार्य रामानुजाचार्य ने उक्त मूर्त्ति   का पुुनध्दार किया और उसे तिरुपति के मंंदिर में प्राण प्रतिष्ठित किया। 


    • संपूर्ण चोल साम्राज्य 6 प्रान्तों में बंटे होते थे। प्रान्त को मंडलम् कहा जाता था। मंडलम् कोटटम् में, कोटटम् नाडु में और नाडु कई कुर्रमों (गाँव) में बंटे होते थे।
    • नाडु के स्थानीय सभा को नाटूर और नगर के स्थानीय सभा को नगरतार कहा जाता था।
    • चोल काल में भूमिकर उपज का 1/3 भाग हुआ करता था।
    • तमिल कवियों में जयंगोंदर प्रसिद्ध कवि था, जो कुलोतुँग प्रथम का राजकवि था। उसकी रचना है- कलिंगतुपर्णि 
    • कंबन, औटटक्कुटटन और पुगलेंदि को तमिल साहित्य का त्रिरत्न कहा जाता हैं।
    • पंप, पोन्न और रन्न कन्नड़ साहित्य के त्रिरत्न माने जाते हैं।
    • पर्सी ब्राऊन ने तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है।
    • चोककालीन नटराज प्रतिमा को चोल कला का सांस्कृतिक सार या निचोड़ कहा जाता है।
    • चोककाल (10वीं शताब्दी) सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कावेरीपट्टनम था।
    • चोलों की राजधानी कालक्रम के अनुसार इस प्रकार थी- उरैयूर, तंजौर, गंगैकोड, चोलपुरम् और कांची।
    • शैव संत इसानशिव पंडित राजेंद्र-I के गुरु थे।
    • विष्णु के उपासक अलवार और शिव के उपासक नयनार संत कहते थे

    Saturday, August 18, 2018

    August 18, 2018

    दक्षिण भारत के दो प्रमुख राजवंश। पल्लव वंश और राष्ट्रकूट वंश।


                           पल्लव वंश


       राजधानी:     काँचीपुरम
       भाषा:           तमिल, तेलगु, संस्कृत एंव प्रकृत
       धर्म:             हिंदू
       शासन:        राजतंत्र


                  पल्लव वंश
    दक्षिण भारत का एक राजवंश था जिसने तमिल और तेलुगु क्षेत्र पर शासन किया। इस वंश की स्थापना सिंह विष्णु ने की थी। पल्लव काल को हिंदू धर्म की उन्नति का काल भी कहा जाता हैैं। पल्लव काल मेें शैैैैव धर्म का प्रचलन अधिक था, लेकिन बौद्ध और जैन धर्मों को भी राज्य का संरक्षण मिला था। इस काल में दक्षिण भारत मेंं शक्ति संप्रदाय प्रगतिशील था।
    काँची का कैलाशनाथ मंदिर और महाबलिपुरम् में रथ मंदिर पल्लव वंश की ही अनमोल देन हैं। पल्लव शासन में राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता और शासन कार्यों के परामर्श के लिए उसकी एक मंत्रिपरिषद् होती थी। सेना का अध्यक्ष सेनापति होता। पल्लवों के पास थल और जल दो प्रकार की सेनाएं थी। पल्लवों का संपूर्ण साम्राज्य मंडलों (प्रांतों) में विभाजित रहते और इस प्रांतों के शासक राजकुमार या अभिजातीय कुल के लोग होते थे।


      ➢ पल्लव वंश के बारे महत्वपूर्ण बातें।

    • पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु (575- 600) था।
    • इसकी राजधानी थी - काँची। (तमिलनाडु में काँचीपुरम) ।
    • सिंहविष्णु वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
    • किरातार्जुनीयम के लेखक भारवि सिंहविष्णु के दरबार में रहते थे।
    • पल्लव वंश के प्रमुख शासक हुए - क्रमश:
    1. महेंद्र वर्मन I (600- 630 ई0), 
    2. नरसिंह वर्मन I (630- 668 ई0),
    3. महेंद्र वर्मन II (668- 670 ई0)
    4. परमेश्वर वर्मन I (670- 680 ई0)
    5. नरसिंहवर्मन II (680- 720 ई0), 
    6. नंदीवर्मन I (731- 795 ई0) ।
    • पल्लव वंश का अंतिम शासक अपराजित (879- 897 ई0) हुआ।
    • मतविलास प्रहसन की रचना महेंद्र वर्मन I ने की थी।
    • महाबलिपुरम् के प्रसिद्ध रथ मदिंर (पंच रथ मदिंर) का निर्माण नरसिंह वर्मन I के द्वारा करवाया गया था। रथ मदिंरों में सबसे छोटा द्रोपदी रथ है जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है।
    • वातपीकोंड की उपाधि नरसिंह वर्मन I ने धारण की थी।
    • काँची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन II ने करवाया था। इसे राजसिध्देश्वर मंदिर भी कहा जाता है। (महाबलिपुरम् में शोर मंदिर)
    • दशकुमारचरित के लेखक दण्डी नरसिंहवर्मन II के दरबार में रहते थे।
    • काँची के मुक्तेश्वर मदिंर और वैकुण्ठ पेरूमाल मदिंर का निर्माण नंदीवर्मन II ने कराया।
    • प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमड्ई अलवार नंदीवर्मन II के समकालीन थे।

     नोट: दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश पल्लव वंश,                 राष्ट्रकूट वंश, चोल वंश, चालुक्य वंश                          (कल्याणी), चालुक्य वंश (वातापी), चालुक्य वंश          (वंगी) आदि को कहा जाता हैं।


                         राष्ट्रकूट वंश 


       राजधानी:      मान्यखेत 
       भाषा:           कन्नड़, संस्कृत 
       धर्म:              हिंदू, बौद्ध, और जैन
       शासन:         राजतंत्र 


     ➢  राष्ट्रकूट वंश के बारे मेंं महत्वपूर्ण बातें:

    • राष्ट्रकूट राजवंश का संस्थापक दंतिदुर्ग (752 ई0) था।
    • इसकी राजधानी मनकिर या मान्यखेत (वर्तमान मालखेड़, शोलापुर के निकट) थी।
    • राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासक थे क्रमश: कृष्ण प्रथम, ध्रुव, गोविंद तृतीय, अमोघवर्ष, कृष्ण II, इन्द्र-III, और कृष्ण III ।
    • ऐलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने करवाया था।
    • ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक जो कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।
    • ध्रुव को 'धारावर्ष' भी कहा जाता था।
    • गोविंद तृतीय ने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग भाग लेकर चक्रायुद्ध और उसके संरक्षक धर्मपाल तथा प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट-II को पराजित किया।
    • पल्लव, पाण्डय, और गंग शासकों के संघ को गोविंद तृतीय ने नष्ट किया।
    • अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था। इसने कन्नड़ में कविराजमार्ग की रचना की।
    • गणितसार संग्रह के लेखक महावीराचार्य और अमोघवृत्ति के लेखक सक्तायना अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे।
    • अमोघवर्ष ने तुंगभद्रा नदी में जल समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।
    • इन्द्र-III के शासनकाल में अरब निवासी अलमसूदी भारत आया; इसने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा।
    • राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण III था। इसी के दरबार में कन्नड़ भाषा के कवि पोन्न रहते थे जिन्होने शांति पुराण की रचना की।
    • कल्याणी के चालुक्य तैपक-II ने 973 ई0 में कर्क को हराकर राष्ट्रकूट राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और कल्याणी के चालुक्य वंश की नींव डाली।
    • प्रसिध्द ऐलोरा और ऐलिफेंटा (महाराष्ट्र) गुफामंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय ही हुआ था।
    • ऐलोरा में 34 शैलकृत गुफाएँ हैं। इसमें 1 से 12 तक बौध्दों, 13 से 29 तक हिंदुओं और 30 से 34 तक जैनों की गुफाएँ हैं।
    • राष्ट्रकूट शैव, वैष्णव, शाक्त सम्प्रदायों के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे।
    • राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुस्लमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम का प्रचार की अनुमति दी थी।

    नोटः आदिपुराण के रचनाकार जिनसेन अमोघवर्ष                के दरबार में रहते थे।