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Saturday, August 25, 2018

August 25, 2018

मगध राज्य।


                    मगध राज्य


 ➢ मगध राज्य के बारे में महत्वपूर्ण बिन्दु:


  • मगध के सबसे प्राचीन वंश के संस्थापक बृहद्रथ था।
  • जरासंध के पिता का नाम बृहद्रथ था।
  • मगध की राजधानी गिरिब्रज (राजग्रह) थी।
  • मगध की गद्दी पर बिम्बिसार 545 ई0 पू0 में बैठा।
  • बिम्बिसार हर्यक वंश का संस्थापक था।
  • बिम्बिसार ने ब्रह्मदत्त को हराकर अंग राज्य को मगध में मिला लिया।
  • बिम्बिसार ने राजग्रह का निर्माण कर उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • बिम्बिसार ने मगध पर करीब 52 वर्षों तक शासन किया।
  • महात्मा बौद्ध की सेवा में बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को भेजा था। अवंति के राजा प्रद्योत जब पाण्डु रोग से ग्रसित थे उस समय भी बिम्बिसार ने जीवक को उनकी सेवा के लिए भेजा था।
  • बिम्बिसार ने वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इसने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से, वैशाली के चेटक की पुत्री चेल्लना से तथा मद्र देश (आधुनिक पंजाब) की राजकुमारी झेमा से शादी की।
  • बिम्बिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी और वह 493 ई0 पू0 में मगध की गद्दी पर बैठा।

  • अजातशत्रु का उपनाम कुणिक था।
  • अजातशत्रु ने 32 वर्षों तक मगध पर शासन किया।
  • अजातशत्रु प्रारंभ में जैनधर्म का अनुयायी था।
  • अजातशत्रु के सुयोग्य मंत्री का नाम वर्षकार (वरस्कार) था। इसी की सहायता से अजातशत्रु ने वैशाली पर विजय प्राप्त की।
  • अजातशत्रु की हत्या उसके पुत्र उदायिन् ने 461 ई0 पू0 में कर दी और वह मगध की गद्दी पर बैठा।
  • उदायिन् ने पाटिलग्राम की स्थापना की।
  • उदायिन् भी जैनधर्म का अनुयायी था।
  • हर्यक वंश का अंतिम राजा उदायिन् का पुत्र नागदशक था।
  • नागदशक को उसके अमात्य शिशुनाग ने 412 ई0 पू0 में अपदस्थ करके मगध पर शिशुनाग वंश की स्थापना की।
  • शिशुनाग ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से हटाकर वैशाली में स्थापित की।
  • शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक पुनः राजधानी को पाटलिपुत्र ले गया।
  • शिशुनाग वंश का अंतिम राजा नंदिवर्धन था।
  • नंदवंश का संस्थापक महापद्म नंद था। 
  • नंदवंश का अंतिम शासक घनानंद था। यह सिकंदर महान का समकालीन था। इसे चंद्रगुप्त मौर्य ने युद्ध में पराजित किया और मगध पर एक नये वंश 'मौर्य वंश' की स्थापना की।

नोटः  बिम्बिसार बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
August 25, 2018

सिन्धु सभ्यता।

          

                      सिन्धु सभ्यता


 ➢ सिन्धु सभ्यता के बारे में महत्वपूर्ण बातें:



  • सिन्धु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की थी।
  • रेडियोकार्बन जैसी नवीन विश्लेषण पध्दति के द्वारा सिन्धु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई0 पू0 से 1750 ई0 पू0 मानी गयी है।
  • इस सभ्यता के निवासी द्रविड़ एंव भुमध्यसागरीय थे।
  • सिन्धु सभ्यता या सैंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। इस सभ्यता में 6 नगरों को बड़ी नगरों की संज्ञा दी गयी है, ये हैं- मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलावीरा राखीगढ़ी और कालीबंगन। 
  • स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए है।
  • जोते हुए खेत और नक्काशीदार ईटों का प्रयोग कालीबंगन नगर में हुआ।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार को सिन्धु सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत मानी जाती है।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त बृहत् स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जिसके मध्य स्थित स्नानकुंड 11.88 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता (पशुपति नाथ) की मुर्ति मिली है। उनके चारों ओर हाथी, गैंडा, चीता, और भैया विराजमान है।
  • मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है।
  • हड़प्पा की मोहरों पर सबसे अधिक एक श्रृंगी पशु का अंकन मिलता है।
  • सिन्धु सभ्यता का बन्दरगाह था- लोथल और सुतकोतदा।
  • सिन्धु सभ्यता की लिपी भावचित्रात्मक है। यह लिपी दाईं से बाईं की ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दाईं से बाईं और दूसरी बाईं से दाईं ओर लिखी जाती थी।
  • सिन्धु सभ्यता के लोगों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रीड पद्धति अपनाई।
  • घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे। केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
  • सिन्धु सभ्यता में मुख्य फसल थी- गेहूँ और जौ।
  • रंगपुर और लोथल से चावल के दाने मिले है, जिनसे धान की खेती होने का भी प्रमाण मिलता है।
  • सिन्धु सभ्यता के लोग मिठाई के लिए शहद का प्रयोग करते थे।


  • सिन्धु सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों और चार पहियों वाली बैलगाड़ी या भैसगाड़ी का उपयोग करते थे।
  • इस सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा किया करते थे।
  • वृक्ष-पूजा और शिव-पूजा के प्रचलन के सबूत भी सिन्धु सभ्यता से मिलते है।
  • सिन्धु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी।
  • स्वस्तिक चिन्ह संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है। इस चिन्ह से सूर्योपासना का अनुमान लगाया जाता है।
  • सिन्धु सभ्यता के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है।
  • पशुओं में कुबड़ वाला साँड़, इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पुज्यनीय था। 
  • सिन्धु सभ्यता के लोग सूती और ऊनी वस्त्रों का उपयोग करते थे।
  • मनोरंजक के लिए सिन्धुवासी मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा आपस में खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे।
  • सिन्धु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।
  • पर्दा-प्रथा और वेश्यावृत्ति सिन्धु सभ्यता में प्रचलित थी।
  • शवों को जलाने और गाड़ने यानी दोनों प्रथाएँ प्रचलित थी। हड़प्पा में शवों को गाड़ने और मोहनजोदड़ो में शवों को जलाने की प्रथा विद्यमान थी। 
  • सिन्धु सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।

नोट: मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा                शब्द का अभिप्राय सिन्धु सभ्यता से ही है।

Friday, August 24, 2018

August 24, 2018

वैदिक सभ्यता।


               वैदिक सभ्यता


  • वैदिककाल का विभाजन दों भागों में किया गया है- 
  1. ऋग्वैदिक काल- 1500-1000 ई0 पू0 
  2. उत्तर वैदिककाल - 1000- 500 ई0 पू0पू0
  • आर्यों द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक सभ्यता कहा जाता है।
  • आर्य सर्वप्रथम पंजाब और अफगानिस्तान में बसे। मैक्स मूलर ने आर्यों का मूल निवास- स्थान मध्य एशिया को माना है।
  • आर्यों द्वारा विकसित सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी।
  • आर्यों की प्रशासनिक ईकाई आरोहि क्रम से इन पाँच भागों में बंटा था- कुल, ग्राम, विश, जन और राष्ट्र
  • ग्राम के मुखिया को ग्रामिणी और विश का प्रधान विशपति कहलाते थे। जन के शासक को राजन कहा जाता है।
  • समाज की सबसे छोटी ईकाई कुल या परिवार थी, जिसका मुखिया पिता होता था, जिसे कुलप भी कहा जाता था।
  • आर्यों का समाज पितृप्रधान था।
  • ऋग्वैदिक समाज चार वर्णों में विभाजित था। वे वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र। यह विभाजन व्यवसाय पर आधारित था। ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुषसूक्त में चतुर्वर्णों का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मण परम पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जाँघों से और शुद्र उनके पैरों से उत्पन्न हुए हैं।
  • वैदिककाल में बाल विवाह और पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था।
  • लेन-देन में वस्तु विनियम की प्रणाली प्रचलित थी।
  • आर्यों का मुख्य पेय पदार्थ सोमरस था। वह वनस्पति से बनाया जाता था।
  • आर्यों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे- संगीत, रथदौड़, घुड़दौड़ और द्यतक्रिड़ा 
  • आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन और कृषि था।


  • आर्यों का प्रिय पशु घोड़ा और सर्वाधिक प्रिय देवता इन्द्र  थे। आर्यों द्वारा खोजी गयी धातु लोहा थी। जिसे श्याम अयस् कहा जाता था। ताँबे को लोहित अयस् कहा जाता था।
  • ऋग्वेद में उल्लिखित सभीं नदियों में सरस्वती सबसे महत्वपूर्ण तथा पवित्र मानी जाती थी।
  • उत्तर वैदिककाल में इन्द्र के स्थान पर प्रजापति सर्वाधिक प्रिय देवता हो गए थे।
  • उत्तर वैदिककाल में राजा के राज्याभिषेक के समय राजसूर्य यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था।
  • उत्तर वैदिककाल में वर्ण व्यवसाय की बजाय जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगे थे।
  • 'सत्यमेवजयते' मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।
  • गायत्री मंत्र सविता नामक देवता को संबोधित है, जिसका संबंध ऋग्वेद से है।
  • महाकाव्य दो है- महाभारत और रामायण 
  • महाभारत का पुराना नाम जयसंहिता है। यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है
  • उपनिषदों की कुल संख्या है- 108
  • महापुराणों की संख्या है-  18
  • वेदांत की संख्या है-  6

नोट:  आर्यों की भाषा संस्कृत थी।

 ➢ ऋग्वैदिककालीन नदियाँ

   प्राचीन नाम     आधुनिक नाम
  1. क्रुभ                 कुर्रम 
  2. कुभा                काबुल
  3. वितस्ता            झेलम
  4. आस्किनी          चुनाव
  5. परुषणी            रावी
  6. शतुद्रि              सतलज 
  7. विपाशा            व्यास
  8. सदानीरा           गंडक
  9. दृसध्दती           घग्घर 
  10. सुवस्तु              स्वात्
  ऋग्वैदिककालीन देवता

   देवता           संबंध 
  1. इन्द्र          युद्ध का नेता और वर्षा का देवता।
  2. अग्नि        देवता और मनुष्य के बीच मध्यस्थ।
  3. वरुण        पृथ्वी और सूर्य के निर्माता, समुद्र का देवता।
  4. सोम         वनस्पति का देवता।
  5. विष्णु        विश्व के संरक्षक और पालनकर्ता 


Thursday, August 23, 2018

August 23, 2018

मौर्य साम्राज्य।

 

                  मौर्य साम्राज्य


 राजधानी:   पाटलिपुत्र (पटना)
 भाषा:         संस्कृत, प्रकति
 धर्म:           बौद्ध, जैन एंव आजीवक
 शासन:       राजतंत्र 


 ➢ मौर्य वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:


  • मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था।
  • चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई0 पू0 में हुआ था।
  • घनानंद को हराने में चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चंद्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री बना।
  • चाणक्य (कौटिल्य/ विष्णुगुप्त) द्वारा लिखित पुस्तक है अर्थशास्त्र, जिसका संबंध राजनीती से है।
  • नंद वंश के विनाश करने में चंद्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा पर्वतक से सहायता प्राप्त की थी।
  • चंद्रगुप्त मगध की राजगद्दी पर 322 ई0 पू0 में बैठा।
  • चंद्रगुप्त ने 305 ई0 पू0 में सेल्यूकस निकेटर को हराया।
  • सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया की शादी चंद्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी और युद्ध की संधि-शर्तों के अनुसार चार प्रांत काबुल, कंधार, हेरात और मकरान चंद्रगुप्त को दिए।
  • चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन गुरु भद्रबाहु से जैनधर्म की दीक्षा ली थी।
  • मेगास्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चंद्रगुप्त के दरबार में रहता था।
  • मेगास्थनीज द्वारा लिखी गयी पुस्तक इंडिका है।
  • चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच हुए युद्ध का वर्णन एप्पियानस ने किया है।
  • प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिया था।


  • चंद्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के                श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया।

    • चंद्रगुप्त मौर्य की म्रत्यु 298 ई0 पू0 में श्रवणबेलगोला में उपवास के द्वारा हुई।



    • चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिंदुसार हुआ, जो 298 ई0 पू0 में मगध की राजगद्दी पर बैठा।
    • अमित्रघात के नाम से बिंदुसार जाना जाता है। अमित्रघात का अर्थ है- शत्रु विनाशक
    • बिंदुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।
    • 'वायुपुराण' में बिंदुसार को भद्रसार (वारिसार) कहा गया है।
    • स्टैबो के अनुसार सीरीयन नरेश एण्टियोकस ने बिंदुसार के दरबार में डाइमेकस नामक राजदूत भेजा। इसे ही मेगास्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है।
    • जैन ग्रंथों में बिंदुसार को सिहंसेन कहा गया है।
    • बिंदुसार के शासनकाल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है। इस विद्रोहों को दबाने के लिए बिंदुसार ने पहले सुसीम को और बाद में अशोक को भेजा।
    • एथीनियस के अनुसार बिंदुसार ने सीरीयन नरेश एण्टियोकस से मदिरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी।
    • बौद्ध विद्वान तारानाथ ने बिंदुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया है।




    • बिंदुसार का उत्तराधिकारी अशोक महान हुुआ जो 269 ई0 पू0  में मगध की राजगद्दी पर बैठा।


  • अशोक की माता का नाम सुभद्रंगी था।

    • राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवंति का राज्यपाल था।
    • मास्की और गुर्जरा अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मिलता है।
    • पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है।
    • अशोक ने अपने अभिषेक के आठवें वर्ष लगभग 261 ई0 पू0 में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।
    • प्लिनी का कथन है कि म्रिस का राजा फिलाडेल्फस टाॅलमी- II ने पाटलिपुत्र में डियानीसियस नाम का एक राजदूत भेजा था।
    • उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।
    • अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।


    • मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था। इसकी हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई0 पू0 में कर दी और शुंग वंश की नींव डाली।
    • अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में प्रांतों की संख्या 5 थी। प्रांतों को चक्र कहा जाता था।
    • प्रांतों के प्रशासक कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे।
    • प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था, जिसका प्रशासक विषयपति होता था।
    • प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका मुखिया ग्रामीक कहलाता था।
    • भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने ही किया।
    • अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्टी, ग्रीक और अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है।
    • ग्रीक और अरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान से,खरोष्टी लिपि का अभिलेख उत्तर पश्चिम पाकिस्तान से और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि का अभिलेख मिले हैं।
    • अशोक के शिलालेख की खोज 1750 ई0 में पाद्रेटी फेन्थैलर ने की थी। इसकी संख्या- 14 है।
    • अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सबसे पहली सफलता 1837 ई0 में जेम्स प्रिसेप को हुई।

    नोट:  विश्वविजेता सिकंदर महान का सेल्यूकस निकेटर          सेनापति था।


    Wednesday, August 22, 2018

    August 22, 2018

    गुप्त साम्राज्य।

         

                       गुप्त साम्राज्य


       राजधानी:     पाटलिपुत्र 
       भाषा:           संस्कृत, प्रकृति 
       धर्म:             हिंदू, बौद्ध, जैन
       शासन:         राजतंत्र 

    ➢ गुप्त वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

    • गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अंत में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ।
    • गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (240-280 ई0) था
    • श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280- 320 ई0) हुआ।
    • गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम था। यह 320 ई0 में गद्दी पर बैठा। इसने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की।
    • गुप्त संवत्  (319-320 ई0) की शुरुआत चन्द्रगुप्त प्रथम ने की।
    • चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ, जो 335 ई0 में राजगद्दी पर बैठा। इसने आर्यावर्त्त के 9 शासकों और दक्षिणावर्त्त के 12 शासकों को पराजित किया। इन्हीं विजयों के कारण इसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।
    • समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था।
    • समुद्रगुप्त विष्णु उपासक था।
    • समुद्रगुप्त ने अश्वमेधकर्त्ता की उपाधि धारण की।
    • समुद्रगुप्त संगीत-प्रेमी था। ऐसा अनुमान उसके सिक्कों पर उसे वीणा-वादन करते हुए दिखाया जाने से लगाया गया है।
    • समुद्रगुप्त ने विक्रमंक की उपाधि धारण की थी। इसे कविराज भी कहा जाता है।
    • समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त-II हुआ, जो 380 ई0 में राजगद्दी पर बैठा।
    • चन्द्रगुप्त-II के शासनकाल में चीनी बौद्ध यात्री फाहियान भारत आया।
    • शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त-II ने चाँदी के सिक्के चलाए।
    • चन्द्रगुप्त-II का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त या गोविंदगुप्त  (415-454 ई0) हुआ।
    • नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी।
    • कुमारगुप्त का उत्तराधिकारी स्कंधगुप्त (455- 467 ई0) हुआ।
    • स्कंधगुप्त ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झिल का पुनरुत्थान किया।
    • स्कंधगुप्त ने पर्णदत्त को सौराष्ट्र का गवर्नर नियुक्त किया।
    • स्कंधगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण शुरू हो गया।
    • अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त था।


    • चन्द्रगुप्त-II के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास थे।
    • चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहनेवाला आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरि थे।
    • गुप्तकाल में विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र (संस्कृत) को संसार का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ माना जाता है। बाइबिल के बाद इसका स्थान दूसरा माना जाता है। 
    • चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहनेवाले कुछ प्रमुख विद्वान थे- आर्यभट्ट,वाराहमिहीर,ब्रह्मगुप्त आदि।
    • पुराणों की वर्तमान रूप में रचना गुप्तकाल में हुई। इसमें ऐतिहासिक परम्पराओं का उल्लेख है।
    • गुप्तकाल में चाँदी के सिक्कों को रूप्यका कहा जाता था।
    • मंदिर बनाने की कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ।
    • सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।

    • गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई 'देश' थी, जिसके शासक को गोप्ता कहा जाता था।
    • दूसरी प्रादेशिक इकाई 'भुुुक्ती थी, जिसके शासक उपरिक कहलाते थे।
    • भुुुक्ती के नीचे विषय नामक प्रशासनिक इकाई होती थी, जिसके प्रमुख विषयपति कहलाते थे।
    • ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।
    • पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी दण्डपाशिक कहलाता था।
    • ग्राम- सभा का मुखिया ग्रामीक कहलाता था।
    • गुप्तकाल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
    • अंजता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही शेष हैं, जिनमें गुफा संख्या 16 और 17 ही गुप्तकालीन हैं। इसमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है।
    • गुफा संख्या 17 के चित्र को चित्रशाला कहा जाता है। इस चित्रशाला में बुध्द के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण और महापरिनिवार्ण की घटनाओं से संबंधित चित्र उध्द्दत किए गए हैं।
    • अंजता की गुफाएँ बौध्द धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।

    नोट: गुप्त सम्राट वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।