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Wednesday, August 22, 2018

August 22, 2018

गुप्त साम्राज्य।

     

                   गुप्त साम्राज्य


   राजधानी:     पाटलिपुत्र 
   भाषा:           संस्कृत, प्रकृति 
   धर्म:             हिंदू, बौद्ध, जैन
   शासन:         राजतंत्र 

➢ गुप्त वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

  • गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अंत में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ।
  • गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (240-280 ई0) था
  • श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280- 320 ई0) हुआ।
  • गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम था। यह 320 ई0 में गद्दी पर बैठा। इसने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की।
  • गुप्त संवत्  (319-320 ई0) की शुरुआत चन्द्रगुप्त प्रथम ने की।
  • चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ, जो 335 ई0 में राजगद्दी पर बैठा। इसने आर्यावर्त्त के 9 शासकों और दक्षिणावर्त्त के 12 शासकों को पराजित किया। इन्हीं विजयों के कारण इसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।
  • समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था।
  • समुद्रगुप्त विष्णु उपासक था।
  • समुद्रगुप्त ने अश्वमेधकर्त्ता की उपाधि धारण की।
  • समुद्रगुप्त संगीत-प्रेमी था। ऐसा अनुमान उसके सिक्कों पर उसे वीणा-वादन करते हुए दिखाया जाने से लगाया गया है।
  • समुद्रगुप्त ने विक्रमंक की उपाधि धारण की थी। इसे कविराज भी कहा जाता है।
  • समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त-II हुआ, जो 380 ई0 में राजगद्दी पर बैठा।
  • चन्द्रगुप्त-II के शासनकाल में चीनी बौद्ध यात्री फाहियान भारत आया।
  • शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त-II ने चाँदी के सिक्के चलाए।
  • चन्द्रगुप्त-II का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त या गोविंदगुप्त  (415-454 ई0) हुआ।
  • नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी।
  • कुमारगुप्त का उत्तराधिकारी स्कंधगुप्त (455- 467 ई0) हुआ।
  • स्कंधगुप्त ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झिल का पुनरुत्थान किया।
  • स्कंधगुप्त ने पर्णदत्त को सौराष्ट्र का गवर्नर नियुक्त किया।
  • स्कंधगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण शुरू हो गया।
  • अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त था।


  • चन्द्रगुप्त-II के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास थे।
  • चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहनेवाला आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरि थे।
  • गुप्तकाल में विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र (संस्कृत) को संसार का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ माना जाता है। बाइबिल के बाद इसका स्थान दूसरा माना जाता है। 
  • चन्द्रगुप्त-II के दरबार में रहनेवाले कुछ प्रमुख विद्वान थे- आर्यभट्ट,वाराहमिहीर,ब्रह्मगुप्त आदि।
  • पुराणों की वर्तमान रूप में रचना गुप्तकाल में हुई। इसमें ऐतिहासिक परम्पराओं का उल्लेख है।
  • गुप्तकाल में चाँदी के सिक्कों को रूप्यका कहा जाता था।
  • मंदिर बनाने की कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ।
  • सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।

  • गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई 'देश' थी, जिसके शासक को गोप्ता कहा जाता था।
  • दूसरी प्रादेशिक इकाई 'भुुुक्ती थी, जिसके शासक उपरिक कहलाते थे।
  • भुुुक्ती के नीचे विषय नामक प्रशासनिक इकाई होती थी, जिसके प्रमुख विषयपति कहलाते थे।
  • ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।
  • पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी दण्डपाशिक कहलाता था।
  • ग्राम- सभा का मुखिया ग्रामीक कहलाता था।
  • गुप्तकाल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
  • अंजता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही शेष हैं, जिनमें गुफा संख्या 16 और 17 ही गुप्तकालीन हैं। इसमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है।
  • गुफा संख्या 17 के चित्र को चित्रशाला कहा जाता है। इस चित्रशाला में बुध्द के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण और महापरिनिवार्ण की घटनाओं से संबंधित चित्र उध्द्दत किए गए हैं।
  • अंजता की गुफाएँ बौध्द धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।

नोट: गुप्त सम्राट वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।

August 22, 2018

राजपूत राजवंश चौहान वंश, परमार वंश, चंदेल वंश।

                     

                      चौहान वंश

  ➢  चौहान वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:


  • चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव था। इस वंश की प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्र थी बाद में अजयराज द्वितीय ने अजमेर नगर की स्थापना की और उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अर्णोराज के पुत्र विग्रहराज-IV वीसलदेव  (1153- 1163 ई0) हुआ।
  • हरिकेली नामक संस्कृत नाटक के रचयिता विग्रहराज-IV था।
  • सोमदेव विग्रहराज-IV के राजकवि थे। इन्होंने ललित विग्रहराज नामक नाटक लिखा।
  • अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद शुरु में विग्रहराज-IV द्वारा निर्मित एक विद्यालय था।
  • इस वंश का अंतिम शासक पृथ्वीराज-III था।
  • रणथम्भौर के जैन मंदिर का शिखर पृथ्वीराज-III ने बनवाया था।
  • तराईन का प्रथम युद्ध 1191 ई0 में हुआ, जिसमें पृथ्वीराज-III ने मुहम्मद गोरी को हरा दिया।
  • तराईन का द्वितीय युद्ध 1192 ई0 में हुआ, जिसमें मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया।


नोट: चंदवरदाई पृथ्वीराज-III का राजकवि था,                    जिसकी रचना पृथ्वीराजरासो है।


                 

                    परमार वंश   
  परमार वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

  • परमार वंश का संस्थापक उपेंद्रराज था। इसकी राजधानी धारा नगरी थी। (प्राचीन राजधानी- उज्जैन) 
  • परमार वंश का सबसे शक्तिशाली शासक राजा भोज था।
  • राजा भोज ने भोपाल के दक्षिण में भोजपुर नामक झिल का निर्माण करवाया।
  • नैषधीयचरित के रचनाकार श्रीहर्ष थे।
  • राजा भोज ने चिकित्सा, गणित और व्याकरण पर अनेक ग्रंथ लिखे। 
  • नवसाहसाड्क चरित के रचयिता पद्मगुप्त, दशरुपक के रचयिता धनंजय, धनिक, हलायुध और अमितगति जैसे विद्वान वाक्यपति मुंज के दरबार में रहते थे।
  • कविराज की उपाधि से विभूषित शासक था- राजा भोज।
  • भोज ने अपनी राजधानी में सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • इस मंदिर के परिसर में संस्कृत विद्यालय भी खोला गया था।
  • राजा भोज के शासनकाल में धारा नगरी विद्या और विद्वानों का प्रमुख केंद्र था।
  • भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया।
  • परमार वंश के बाद तोमर वंश का, उसके बाद चौहान वंश का और अंतत: 1297 ई0 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नसरत खाँ और उलुग खाँ ने मालवा पर अधिकार कर लिया।
नोट: भोजपुर नगर की स्थापना राजा भोज ने की थी।




                      चंदेल वंश

  चंदेल वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

  • प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद बुंदेलखंड की भूमि पर चंदेल वंश का स्वतंत्र राजनितिक इतिहास प्रारंभ हुआ।
  • चंदेल वंश का संस्थापक है- नन्नुक (831 ई0)
  • इसकी राजधानी खजुराहो थी। प्रारंभ में इसकी राजधानी कालिंजर (महोबा) थी।
  • राजा धंग ने अपनी राजधानी कालिंजर से खजुराहो में स्थानांतरित की थी।
  • चंदेल वंश का प्रथम स्वतंत्र और सबसे प्रतापी राजा यशोवर्मन था।
  •  यशोवर्मन ने कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा देवपाल को हराया और उससे एक विष्णु की प्रतिमा प्राप्त की, जिसे उसने खजुराहो के विष्णु मंदिर में स्थापित की।
  • धंग ने ही  जिन्न नाथ, विश्वनाथ, वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
  • धंग ने गंगा-यमुना के पवित्र संगम में शिव की आराधना करते हुए अपने शरीर का त्याग किया।
  • चंदेल शासक विद्याधर ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी, क्योंकि उसने महमूद के आक्रमण का सामना किए बिना ही आत्मसमर्पण कर दिया था।
  • विद्याधर ही अकेला भारतीय नरेश था जिसने महमूद गजनी की महत्वाकांक्षाओं का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।
  • चंदेल शासक किर्तिवर्मन की राज्यसभा में रहनेवाले कृष्ण मिश्र ने प्रबोध चंद्रोदय की रचना की थी।
  • किर्तिवर्मन ने महोबा के समीप किर्तिसागर नामक जलाशय का निर्माण किया।
  • आल्हा-उदल नामक दों सेनानायक परमर्दिदेव के दरबार में रहते थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करते हुए अपनी जान गँवायी थी।
  • चंदेल वंश के अंतिम शासक परमर्दिदेव ने 1202 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक की अधिनता स्वीकार कर ली। इस पर उसके मंत्री अजयदेव ने उसकी हत्या कर दी।
नोट: बुंदेलखंड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है।




                   सोलंकी वंश

 सोलंकी वंश के बारे महत्वपूर्ण बातें:

  • सोलंकी वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था।
  • इसकी राजधानी अन्हिलवाड़ थी।
  • मूलराज प्रथम शैवधर्म का अनुयायी था।
  • भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
  • भीम प्रथम के सामंत बिमल ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर बनवाया था।
  • सोलंकी वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक जयसिंह सिध्दराज था।
  • माऊण्ट आबु पर्वत (राजस्थान) पर एक मंडप बनाकर जयसिंह सिध्दराज ने अपने सात पूर्वजों की गजारोही मूर्त्तियों की स्थापना की।
  • मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण सोलंकी राजाओं के शासनकाल में हुआ था।
  • सिध्दपुर के रुद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण जयसिंह सिध्दराज ने ही किया था।  
  • सोलंकी शासक कुमारपाल जैन-मतानुयायी था। वह जैन धर्म के अंतिम राजकीय प्रवर्तक के रुप में प्रसिद्ध है।
  • सोलंकी वंश का अंतिम शासक भीम-II था।
  • भीम-II के एक सामंत लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की थी।
  • बघेल वंश का कर्ण-II गुजरात का अंतिम हिंदू शासक था, इसने अलाउद्दीन खिलजी की सेेनाओं का मुकााबला किया था।

नोट: प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचंद्र जयसिंह सिध्दराज के          दरबार में रहता था।



Tuesday, August 21, 2018

August 21, 2018

पाल वंश, सेनवंश और कश्मीर के राजवंश।

                     

                        पाल वंश

 ➢ पालवंश के बारें में महत्वपूर्ण बातें:


  • पाल वंश का संस्थापक गोपाल (750 ई0) था।
  • इस वंश की राजधानी मुंगेर थी।
  • गोपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसने ओदंतपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
  • पाल वंश के प्रमुख शासक थे- धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल, महिपाल, नयपाल, आदि।
  • कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष पालवंश, गुर्जर प्रतिहार वंश और राष्ट्रकूट वंश के बीच हुआ। इसमें पालवंश की ओर से सर्वप्रथम धर्मपाल शामिल हुआ था।
  • पालवंश का सबसे महान शासक धर्मपाल था इसी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
  • 11वीं सदी के गुजराती कवि सोडठल ने धर्मपाल को 'उत्तरापथ स्वामी' की उपाधि से संबोधित किया है।
  • ओदंतपुरी (बिहार) के प्रसिद्ध बौद्ध मठ का निर्माण देवपाल ने करवाया था।
  • जावा के शैलेन्द्रवंशी शासक बालपुत्र देव के अनुरोध पर देवपाल ने उसे नालंदा में एक बौद्धविहार बनवाने के लिए पाँच गाँव दान में दिए थे।
  • गौड़ीरीति नामक साहित्यिक विद्या का विकास पाल शासकों के समय में हुआ।

 नोट:  पाल शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।


                          सेन वंश

 ➢ सेनवंश के बारें में महत्वपूर्ण बातें:

  • सेन वंश की स्थापना सामंत सेन ने राढ़ में की थी।
  • इसकी राजधानी नदिया (लखनौती) थी।
  • सेन वंश के प्रमुख शासक विजयसेन, बल्लार सेन और लक्ष्मण सेन थे।
  • सेन वंश के प्रथम स्वतंत्र शासक विजयसेन था, जो शिवधर्म का अनुयायी था।
  • दानसागर और अद्भुत सागर की रचना सेन शासक बल्लालसेन ने की थी।अद्भुत सागर को लक्ष्मण सेन ने पूर्णरूप दिया था।
  • लक्ष्मण सेन की राज्यसभा में गीतगोविंद के लेखक जयदेव, पवनदूत के लेखक धोयी और ब्राह्मणसर्वस्व के लेखक हलायुद्ध रहते थे।
  • हलायुद्ध लक्ष्मण सेन का प्रधान न्यायाधीश और मुख्यमंत्री था।
  • विजयसेन ने देवपाड़ा में प्रद्युम्नेश्वर मंदिर (शिव की विशाल मंदिर) की स्थापना की।
  • सेन राजवंश प्रथम राजवंश था, जिसने अपना अभिलेख सर्वप्रथम हिंदी में उत्कीर्ण करवाया।

 नोट: लक्ष्मण सेन बंगाल का अंतिम हिन्दू राजा था।



                    कश्मीर के राजवंश  

 ➢ कश्मीर राजवंश के बारें में महत्वपूर्ण बातें:

  • कश्मीर पर शासन करने वाले शासक वंश कालक्रम से इस प्रकार थे- कार्कोट वंश, उत्पल वंश, लोहार वंश।
  • 7वीं शताब्दी में दुर्लभवर्ध्दन नामक व्यकि ने कश्मीर में कार्कोट वंश की स्थापना की।
  • प्रतापपुर नगर की स्थापना दुर्लभक ने की।
  • कार्कोट वंश का सबसे प्रतापी राजा ललितादित्य मुक्तापीड था।
  • कश्मीर का मर्त्तण्ड मंदिर का निर्माण ललितादित्य के द्वारा करवाया गया था।
  • कार्कोट वंश के बाद कश्मीर पर उत्पक वंश का शासन हुआ। इस वंश का संस्थापक अवंतिवर्मन था।
  • अवंतिवर्मन के अभियन्ता सूय्य ने सिचांई के लिए नहरों का निर्माण करवाया।
  • 980 ई0 में उत्पक वंश की रानी दिद्दा एक महत्वकांक्षिणी शासिका हुई।
  • उत्पक वंश के बाद कश्मीर पर लोहार वंश का शासन हुआ।
  • लोहार वंश का संस्थापक संग्रामराज था।
  • संग्रामराज के बाद अन्नत राजा हुआ। इसकी पत्नी सुर्यमती ने प्रशासन को सुधारने में उसकी सहायता की।
  • लोहार वंश का शासक हर्ष विद्वान, कवि और कई भाषाओं का ज्ञाता था।
  • कल्हण हर्ष का आश्रित कवि था।
  • जयसिंह लोहार वंश का अंतिम शासक था, जिसने 1128 ई0 से 1155 ई0 तक शासन किया। जयसिंह के शासन के साथ ही कल्हण की राजतरंगिणी का विवरण समाप्त हो जाता है

 नोट: अवंतिपुर नामक नगर की स्थापना अवंतिवर्मन           ने की थी।

Monday, August 20, 2018

August 20, 2018

चालुक्य वंश

           

               चालुक्य वंश (कल्याणी)

  राजधानी:     वतापी (बदामी), कल्याणी, वेंगी
  भाषा:           कन्नड, संस्कृत
  धर्म:             हिंदू, बौद्ध, जैन
  शासन:         राजतंत्र 


चालुक्य वंश (कल्याणी) के बारे में महत्वपूर्ण           बातें:


  •  कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना तैलप- II ने की थी।
  • तैलप- II की राजधानी मान्यखेट थी।
  • चालुक्य वंश (कल्याणी) के प्रमुख शासक हुए- तैलप- I, तैलप- II, विक्रमादित्य, जयसिंह, सोमेश्वर, सोमेश्वर-II,  विक्रमादित्य-VI, सोमेश्वर-III, और तैलप- III।
  • सोमेश्वर-I ने मान्यखेट से राजधानी हटाकर कल्याणी (कर्नाटक) को बनाया।
  • इस वंश  का सबसे प्रतापी राजा विक्रमादित्य-VI था।
  • विल्हण और विज्ञानेश्वर विक्रमादित्य-VI के दरबार में ही रहते थे।
  • मिताक्षरा  (हिंदू विधि ग्रंथ, याज्ञवल्क्य स्मृति पर व्याख्या) नामक ग्रंथ की रचना महान विधिवेत्ता विज्ञानेश्वर ने की थी।
  • विक्रमांकचरित की रचना विल्हण ने की थी। इसमे विक्रमादित्य-VI के जीवन पर प्रकाश डाला गया है।

                    चालुक्य वंश (वतापी)

➢ चालुक्य वंश (कल्याणी) के बारे में महत्वपूर्ण           बातें:

  • वतापी के चालुक्य वंश की स्थापना जयसिंह ने की थी।
  • इसकी राजधानी वतापी (बीजापुर) थी।
  •  चालुक्य वंश  (वतापी) के प्रमुख शासक थे- पुुुुलकेशिन-I,किर्त्तिवर्मन, पुुुुलकेशिन-II, विक्रमादित्य, विनयादित्य, और विजयादित्य।
  • इस वंश का सबसे प्रतापी राजा पुुुुलकेशिन-II था।
  • महाकूट स्तम्भ लेख से प्रमाणित होता है कि  पुुुुलकेशिन बहुुुु सुवर्ण और अग्निष्टोम यज्ञ सम्पन्न करवाया था।
  •  पुुुुलकेशिन-II ने हर्षवर्ध्दन को हराकर परमेश्वर की उपाधि धारण की।
  •  पुुुुलकेशिन-II वातापी चालुक्य शासकों में सर्वाधिक पराक्रमी और महान था। इसने 'दक्षिणापथेश्वर' की उपाधि धारण की थी।
  • पल्लववंशी शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुुुुलकेशिन-II को परास्त किया और उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया। सम्भवतः इसी युद्ध में पुुुुलकेशिन-II मारा गया। इसी विजय के बाद नरसिंहवर्मन ने 'वातापिकोड' की उपाधि धारण की।
  • ऐलोह अभिलेख का संबंध पुुुुलकेशिन-II से है।
  • जिनेन्द्र का मेगुती मंदिर पुुुुलकेशिन-II ने बनवाया था।
  • अजन्ता के एक गुफा चित्र में फारसी दूत-मंडल का स्वागत करते हुए पुुुुलकेशिन-II को दिखाया गया है।
  • वातापी का निर्माणकर्त्ता किर्त्तिवर्मन को माना जाता है।
  • मालवा को जीतने के बाद विनयादित्य ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की।
  • विक्रमादित्य- II के शासनकाल में ही दक्कन में अरबों ने आक्रमण किया। इस आक्रमण का मुकाबला विक्रमादित्य के भतीजा पुलकेशी ने किया। इस अभियान की सफलता पर विक्रमादित्य- II नेे इसे अवनिजनाश्रय की उपाधि प्रदान की।
  • विक्रमादित्य- II की प्रथम पत्नी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में विरूपाक्षमहादेव मंदिर का निर्माण करवाया।
  • विक्रमादित्य- II की दूसरी पत्नी त्रैलोक्य दैवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
  • इस वंश का अंतिम राजा किर्त्तिवर्मन- II  था। इसे इसके सांमत दंतिदुर्ग ने परास्त कर एक नये वंश (राष्ट्रकूट वंश) की स्थापना की।


                    चालुक्य वंश (वेंगी)

➢ चालुक्य वंश (कल्याणी) के बारे में महत्वपूर्ण           बातें:

  • बेंगी के चालुक्य वंश की स्थापना विष्णुवर्धन था।
  • इसकी राजधानी बेंगी (आंध्र प्रदेश) में थी।
  • इस के प्रमुख शासक थे - जयसिंह-I, इंद्रवर्धन, विष्णुवर्धन-II, जयसिंह-II, और विष्णुवर्धन-III.
  • इस वंश के सबसे प्रतापी राजा विजयादित्य-III था। जिसका सेनापति पंडरंग था।




Sunday, August 19, 2018

August 19, 2018

चोल वंश।

                   

                        चोल वंश


➢ चोल वंश के बारे में महत्वपूर्ण बातें:

  • चोल वंश के संस्थापक विजयालय (850- 87 ई0)
  • इसकी राजधानी तांजाय  (तंजौर या तंक्षुवर) था।
  • विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की  थी।
  • चोलों का स्वतंत्र राज्य आदित्य प्रथम ने किया था।
  • पल्लवों पर विजय पाने के बाद आदित्य प्रथम ने कोदण्डराम की उपाधि धारण की।
  • चोल वंश के प्रमुख राजा था- परांतक-I, राजराज-I, राजेंद्र-I, राजेंद्र-II, और कुलोत्तंग
  • तक्कोलम के युद्ध में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण-III ने परांतक-I को पराजित किया। इस युद्ध में परांतक-I का बड़ा लड़का राजादित्य मारा गया।
  • राजराज-I ने श्रीलंका पर आक्रमण किया। वहाँ के राजा महिम-V को भागकर श्रीलंका के दक्षिण जिला रोहण में शरण लेनी पड़ी।
  • राजराज-I ने श्रीलंका के विजित प्रदेशों को चोल साम्राज्य का एक नया प्रांत मुम्ड़िचोलमंडलम बनाया और पोलन्नरुवा को इसकी राजधानी बनाया।
  • राजराज-I शैव धर्म का अनुयायी था।
  • राजराज-I ने तांजौर राजराजेश्वर का शिवमंदिर बनवाया।
  • चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेंद्र-I के शासनकाल में हुआ।
  • बंगाल के पाल शासक महिपाल को पराजित करने बाद राजेंद्र-I ने गंगैकोडचोल की उपाधि धारण की और अपनी नवीन राजधानी गंगैकोड चोलपुरम के निकट चोलगंगम नामक विशाल तालाब का निर्माण करवाया।
  • राजेंद्र-II ने प्रकेसरी की उपाधि धारण की।
  • वीर राजेंद्र ने राजकेसरी की उपाधि धारण की।
  • चोल वंश का अंतिम राजा राजेंद्र-III था।
  • चोलों और पश्चिमी चालुक्य के बीच शांति स्थापित करने में गोवा के कदम्ब शासक जयकेश-I ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
  • कुलोत्तंग-II ने चिदंबरम मंदिर में स्थित गोविंदराज  (विष्णु) की मूर्त्ति को समुद्र में फेकवा दिया, कालांतर में वैष्णव आचार्य रामानुजाचार्य ने उक्त मूर्त्ति   का पुुनध्दार किया और उसे तिरुपति के मंंदिर में प्राण प्रतिष्ठित किया। 


  • संपूर्ण चोल साम्राज्य 6 प्रान्तों में बंटे होते थे। प्रान्त को मंडलम् कहा जाता था। मंडलम् कोटटम् में, कोटटम् नाडु में और नाडु कई कुर्रमों (गाँव) में बंटे होते थे।
  • नाडु के स्थानीय सभा को नाटूर और नगर के स्थानीय सभा को नगरतार कहा जाता था।
  • चोल काल में भूमिकर उपज का 1/3 भाग हुआ करता था।
  • तमिल कवियों में जयंगोंदर प्रसिद्ध कवि था, जो कुलोतुँग प्रथम का राजकवि था। उसकी रचना है- कलिंगतुपर्णि 
  • कंबन, औटटक्कुटटन और पुगलेंदि को तमिल साहित्य का त्रिरत्न कहा जाता हैं।
  • पंप, पोन्न और रन्न कन्नड़ साहित्य के त्रिरत्न माने जाते हैं।
  • पर्सी ब्राऊन ने तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है।
  • चोककालीन नटराज प्रतिमा को चोल कला का सांस्कृतिक सार या निचोड़ कहा जाता है।
  • चोककाल (10वीं शताब्दी) सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कावेरीपट्टनम था।
  • चोलों की राजधानी कालक्रम के अनुसार इस प्रकार थी- उरैयूर, तंजौर, गंगैकोड, चोलपुरम् और कांची।
  • शैव संत इसानशिव पंडित राजेंद्र-I के गुरु थे।
  • विष्णु के उपासक अलवार और शिव के उपासक नयनार संत कहते थे

Saturday, August 18, 2018

August 18, 2018

दक्षिण भारत के दो प्रमुख राजवंश। पल्लव वंश और राष्ट्रकूट वंश।


                       पल्लव वंश


   राजधानी:     काँचीपुरम
   भाषा:           तमिल, तेलगु, संस्कृत एंव प्रकृत
   धर्म:             हिंदू
   शासन:        राजतंत्र


              पल्लव वंश
दक्षिण भारत का एक राजवंश था जिसने तमिल और तेलुगु क्षेत्र पर शासन किया। इस वंश की स्थापना सिंह विष्णु ने की थी। पल्लव काल को हिंदू धर्म की उन्नति का काल भी कहा जाता हैैं। पल्लव काल मेें शैैैैव धर्म का प्रचलन अधिक था, लेकिन बौद्ध और जैन धर्मों को भी राज्य का संरक्षण मिला था। इस काल में दक्षिण भारत मेंं शक्ति संप्रदाय प्रगतिशील था।
काँची का कैलाशनाथ मंदिर और महाबलिपुरम् में रथ मंदिर पल्लव वंश की ही अनमोल देन हैं। पल्लव शासन में राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता और शासन कार्यों के परामर्श के लिए उसकी एक मंत्रिपरिषद् होती थी। सेना का अध्यक्ष सेनापति होता। पल्लवों के पास थल और जल दो प्रकार की सेनाएं थी। पल्लवों का संपूर्ण साम्राज्य मंडलों (प्रांतों) में विभाजित रहते और इस प्रांतों के शासक राजकुमार या अभिजातीय कुल के लोग होते थे।


  ➢ पल्लव वंश के बारे महत्वपूर्ण बातें।

  • पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु (575- 600) था।
  • इसकी राजधानी थी - काँची। (तमिलनाडु में काँचीपुरम) ।
  • सिंहविष्णु वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
  • किरातार्जुनीयम के लेखक भारवि सिंहविष्णु के दरबार में रहते थे।
  • पल्लव वंश के प्रमुख शासक हुए - क्रमश:
  1. महेंद्र वर्मन I (600- 630 ई0), 
  2. नरसिंह वर्मन I (630- 668 ई0),
  3. महेंद्र वर्मन II (668- 670 ई0)
  4. परमेश्वर वर्मन I (670- 680 ई0)
  5. नरसिंहवर्मन II (680- 720 ई0), 
  6. नंदीवर्मन I (731- 795 ई0) ।
  • पल्लव वंश का अंतिम शासक अपराजित (879- 897 ई0) हुआ।
  • मतविलास प्रहसन की रचना महेंद्र वर्मन I ने की थी।
  • महाबलिपुरम् के प्रसिद्ध रथ मदिंर (पंच रथ मदिंर) का निर्माण नरसिंह वर्मन I के द्वारा करवाया गया था। रथ मदिंरों में सबसे छोटा द्रोपदी रथ है जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है।
  • वातपीकोंड की उपाधि नरसिंह वर्मन I ने धारण की थी।
  • काँची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन II ने करवाया था। इसे राजसिध्देश्वर मंदिर भी कहा जाता है। (महाबलिपुरम् में शोर मंदिर)
  • दशकुमारचरित के लेखक दण्डी नरसिंहवर्मन II के दरबार में रहते थे।
  • काँची के मुक्तेश्वर मदिंर और वैकुण्ठ पेरूमाल मदिंर का निर्माण नंदीवर्मन II ने कराया।
  • प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमड्ई अलवार नंदीवर्मन II के समकालीन थे।

 नोट: दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश पल्लव वंश,                 राष्ट्रकूट वंश, चोल वंश, चालुक्य वंश                          (कल्याणी), चालुक्य वंश (वातापी), चालुक्य वंश          (वंगी) आदि को कहा जाता हैं।


                     राष्ट्रकूट वंश 


   राजधानी:      मान्यखेत 
   भाषा:           कन्नड़, संस्कृत 
   धर्म:              हिंदू, बौद्ध, और जैन
   शासन:         राजतंत्र 


 ➢  राष्ट्रकूट वंश के बारे मेंं महत्वपूर्ण बातें:

  • राष्ट्रकूट राजवंश का संस्थापक दंतिदुर्ग (752 ई0) था।
  • इसकी राजधानी मनकिर या मान्यखेत (वर्तमान मालखेड़, शोलापुर के निकट) थी।
  • राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासक थे क्रमश: कृष्ण प्रथम, ध्रुव, गोविंद तृतीय, अमोघवर्ष, कृष्ण II, इन्द्र-III, और कृष्ण III ।
  • ऐलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने करवाया था।
  • ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक जो कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।
  • ध्रुव को 'धारावर्ष' भी कहा जाता था।
  • गोविंद तृतीय ने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग भाग लेकर चक्रायुद्ध और उसके संरक्षक धर्मपाल तथा प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट-II को पराजित किया।
  • पल्लव, पाण्डय, और गंग शासकों के संघ को गोविंद तृतीय ने नष्ट किया।
  • अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था। इसने कन्नड़ में कविराजमार्ग की रचना की।
  • गणितसार संग्रह के लेखक महावीराचार्य और अमोघवृत्ति के लेखक सक्तायना अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे।
  • अमोघवर्ष ने तुंगभद्रा नदी में जल समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।
  • इन्द्र-III के शासनकाल में अरब निवासी अलमसूदी भारत आया; इसने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा।
  • राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण III था। इसी के दरबार में कन्नड़ भाषा के कवि पोन्न रहते थे जिन्होने शांति पुराण की रचना की।
  • कल्याणी के चालुक्य तैपक-II ने 973 ई0 में कर्क को हराकर राष्ट्रकूट राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और कल्याणी के चालुक्य वंश की नींव डाली।
  • प्रसिध्द ऐलोरा और ऐलिफेंटा (महाराष्ट्र) गुफामंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय ही हुआ था।
  • ऐलोरा में 34 शैलकृत गुफाएँ हैं। इसमें 1 से 12 तक बौध्दों, 13 से 29 तक हिंदुओं और 30 से 34 तक जैनों की गुफाएँ हैं।
  • राष्ट्रकूट शैव, वैष्णव, शाक्त सम्प्रदायों के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे।
  • राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुस्लमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम का प्रचार की अनुमति दी थी।

नोटः आदिपुराण के रचनाकार जिनसेन अमोघवर्ष                के दरबार में रहते थे।

Friday, August 17, 2018

August 17, 2018

लोदी वंश


       लोदी वंश (1451- 1526 ई0)


   राजधानी:      दिल्ली,आगरा 
   भाषा:           फारसी 
   धर्म:             सुन्नी इस्लाम 
   शासन:         सल्तनत 

   पहला सुल्तान:      बहलोल लोदी 
   अंतिम सुल्तान:      इब्राहिम लोदी


                 लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने 1451 ई0 में की थी। लोदीयों को अफगान नस्ल की एक जाती मानी हैं। अनेकों समस्याओं केे बावजूद बहलोल लोदी अपने साम्राज्य का विस्तार करने मेें सफल रहा। जौनपुर का शर्की सुल्तान उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी था। लोदी वंश का वह योग्य शासक माना जाता हैं। सिकंदर लोदी ने आगरा को अपनी राजधानी बनाई थी। बिहार को अपने राज्य मेें मिलाना सिकंदर लोदी की बड़ी सफलता थी। इब्राहिम लोदी लोदी वंश अथवा दिल्ली सल्तनत का अंतिम सुल्तान था।


  ➢  लोदी वंश के बारे महत्वपूर्ण बिंदू:

  • लोदी वंश का संस्थापक बहलोल लोदी था।
  • 19 अप्रैल, 1451 ई0 को 'बहलोल शाहगाजी' की उपाधी से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।
  • दिल्ली पर प्रथम अफगान राज्य की स्थापना का श्रेय बहलोल लोदी को दिया जाता हैं।
  • बहलोल लोदी ने बहलोल सिक्के की शुरुआत की थी।
  • वह अपने सरदारों को मकसदे-ए-अली कहकर पुकारता था।
  • वह अपने सरदारों के खड़े रहने पर स्वयं भी खड़ा रहता था।
  • बहलोल लोदी का पुत्र निजाम खाँ 17 जुलाई, 1489 ई0 को 'सुल्तान सिकंदर शाह' की उपाधि से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।
  • सिकंदर लोदी ने ही आगरा शहर की स्थापना की।
  • इसने आगरा को अपनी राजधानी बनाया।
  • भूमि मापने के लिए प्रामाणिक पैमाना गजे सिकंदरी की शुरुआत सिकंदर लोदी ने की थी।
  • 'गुलरुखी' शीर्षक से फारसी कविताएँ लिखने वाला सुल्तान सिकंदर लोदी था।
  • इसके आदेश पर संस्कृत के एक आयुर्वेद ग्रंथ का फारसी में फरहंगे सिकंदरी के नाम से अनुवाद हुआ।
  • इसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर की मुर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को कसाइयों को मांस तौलने के लिए दे दिया था।
  • इसने मुसलमानों को ताजिया निकालने एवं मुस्लिम स्त्रियों को पीरों और संतों के मजार पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
  • मोठ की मस्जिद का निर्माण सिकंदर लोदी के वजीर के द्वारा करवाया गया था।
  • गले की बीमारी के कारण सिकंदर लोदी की 21 नवम्बर, 1517 ई0 को हो गयी। इसी दिन इसका पुत्र 'इब्राहिम शाह' की उपाधि से आगरा के सिंहासन पर बैठा।
  • 21 अप्रैल, 1526 ई0 को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी बाबर से हार गया। वह इस युद्ध में मारा गया।
  • बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी और इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खाँ ने दिया था।

नोट: सैय्यद वंश ने 1414-1451 ई0 तक दिल्ली              पर शासन किया था।

➢  सैय्यद वंश के बारे कुछ जानकारियां।
  • सैय्यद वंश का संस्थापक ख्रिज खाँ था। ख्रिज खाँ तैमूरलंग का सेनापति था। 
  • भारत पर आक्रमण कर लौटते समय तैमूरलंग ने ख्रिज खाँ को मुल्तान और लाहौर का शासक नियुक्त किया था।
  • ख्रिज खाँ तैमूरलंग के पुत्र शाहरुख को नियमित रूप से कर भेजा  था।
  • इसकी म्रत्यु 20 मई, 1421 ई0 में हो गयी।
  • ख्रिज खाँ के बाद उसका पुत्र मुबारक शाह शासक बना। इसने यमुना के किनारे मुबारकाबाद की स्थापना की थी।
  • सैय्यद वंश का अंतिम सुल्तान अलाउद्दीन आलम शाह था।
  • सैय्यद वंश का शासन करीब 37 वर्षों तक रहा।

➢ चुकिं सैय्यद वंश और लोदी वंश भी दिल्ली             सल्तनत का भाग है इसलिए दिल्ली सल्तनत           के बारें में कुुुुछ महत्वपूर्ण बातें जान ले।

        दिल्ली सल्तनत (1206 -1526 ई0) 


        राजधानी:       लाहौर (1206 -1210 ई0)
                              बदांयू  (1210 -1214 ई0)
                              दिल्ली (1214 -1327 ई0)
                              दौलताबाद (1327 -1334 ई0)
                              दिल्ली   (1334 -1506 ई0)
                             आगरा  (1506 -1526 ई0)

        भाषा:               फारसी
                                हिंदवी 
        धर्म:                  सुन्नी इस्लाम 
        शासन:              सल्तनत 

    प्रथम सुल्तान:    कुतुबुद्दीन ऐबक
    अंतिम सुल्तान:   इब्राहिम लोदी

     स्थापना:    जून, 1206 ई0
     अंत:          पानीपत का प्रथम युद्ध  (अप्रैल,                             1526 ई0)

     ➢  दिल्ली सल्तनत के बारे महत्वपूर्ण बिंदु


    • 1206 ई0 से 1526 ई0 तक भारत में दिल्ली सल्तनत के पाँच राजवंशों ने शासन किया। इन पाँच राजवंशों के शासनकाल को सल्तनतकाल कहा जाता हैं। यह पाँच राजवंशों निम्न हैं।
    1. गुलाम वंश  (1206 -1290 ई0) 
    2. खिलजी वंश  (1290 -1320 ई0)
    3. तुगलक वंश  (1320 -1398 ई0)
    4. सैयद वंश  (1414 -1451 ई0)
    5. लोदी वंश  (1451 -1526 ई0)

    • तुर्क आक्रमणकारियों द्वारा शासन किए हुए राज्य को ही दिल्ली सल्तनत कहा जाता हैं। 
    • सल्तनतकाल (1206 ई0-1526 ई0) में सुल्तान राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था।
    • सुल्तान स्वयं को अल्लाह का प्रतिनिधि मानता था। कुरान के नियमों के अनुसार शासन चलाता था।
    • सुल्तान को शासन-कार्य में सहायता देने के लिए मंत्रिपरिषद होती थी।
    • सल्तनतकाल (1206 ई0-1526 ई0) में चार प्रकार के कर किए जाते थे, खम्स, खराज, जकात और जजिया (सिर्फ हिन्दुओं से)
    • साम्राज्य प्रांतो में बंटे होते थे। प्रत्येक प्रांतो का शासक सूबेदार होता था।
    • प्रधानमंत्री को वजीर कहा जाता था।